झाँसी की रानी – यहाँ सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता ‘झाँसी की रानी’ को आसान भाषा में समझाया गया है। प्रत्येक काव्यांश के साथ मूल पंक्तियाँ, कठिन शब्दों के अर्थ और सरल व्याख्या दी गई है, जिससे विद्यार्थी कविता के भाव और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को आसानी से समझ सकें।

📑 विषय-सूची (Table of Contents)
1. झाँसी की रानी कविता का सारांश
कविता की शुरुआत 1857 की क्रांति के वातावरण से होती है। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीयों में स्वतंत्रता की नई चेतना जाग उठती है। इसी पृष्ठभूमि में रानी लक्ष्मीबाई की वीरता सामने आती है।
लक्ष्मीबाई बचपन से साहसी थीं। वे नाना साहब के साथ पढ़ती-खेलती थीं और अस्त्र-शस्त्र चलाने तथा युद्ध-कला में रुचि रखती थीं। विवाह के बाद वे झाँसी की रानी बनीं। राजा की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने झाँसी पर अधिकार करने का प्रयास किया।
अंग्रेजों की नीतियों और भारतीय राजघरानों के अपमान से देश के विभिन्न भागों में विद्रोह की भावना फैल गई। अनेक क्रांतिकारियों के साथ रानी लक्ष्मीबाई भी संघर्ष में उतर पड़ीं। उन्होंने अंग्रेजी सेना का वीरतापूर्वक सामना किया, कालपी पहुँचीं और आगे ग्वालियर पर अधिकार किया।
अंतिम संघर्ष में चारों ओर से घिर जाने के बाद भी रानी ने युद्ध जारी रखा। वे घायल होकर वीरगति को प्राप्त हुईं। कवयित्री उनके बलिदान को अमर मानती हैं और रानी के जीवन को स्वतंत्रता, साहस और स्वाभिमान की अमिट निशानी के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
↑ ऊपर जाएँ2. सुभद्रा कुमारी चौहान – कवयित्री परिचय
सुभद्रा कुमारी चौहान का जन्म 1904 में प्रयागराज, उत्तर प्रदेश में हुआ। वे साहित्यकार होने के साथ स्वतंत्रता सेनानी भी थीं और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। उनकी रचनाओं में देशप्रेम, स्वतंत्रता, साहस और सामाजिक संवेदना प्रमुख रूप से दिखाई देती है।
उनकी भाषा सहज और प्रभावशाली है। ‘झाँसी की रानी’ उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कविताओं में से एक है। उनकी प्रमुख रचनाओं में मुकुल, त्रिधारा, बिखरे मोती, उन्मादिनी और सीधे-सादे चित्र शामिल हैं।
↑ ऊपर जाएँ3. पाठ में प्रवेश
‘झाँसी की रानी’ सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध वीर-रस प्रधान कविता है। यह कविता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित है। इसमें रानी लक्ष्मीबाई के बचपन, युद्ध-कौशल, विवाह, झाँसी पर आए संकट, अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष और अंततः उनके बलिदान का ओजपूर्ण वर्णन किया गया है।
कविता केवल रानी लक्ष्मीबाई की वीरगाथा नहीं है, बल्कि उस समय भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में फैल रही स्वतंत्रता की चेतना को भी सामने लाती है। इसकी भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण, ओजपूर्ण और गेय है।
मूल भाव: इस कविता का मूल भाव देशप्रेम, स्वतंत्रता, वीरता, स्वाभिमान और बलिदान है। रानी लक्ष्मीबाई के जीवन के माध्यम से कवयित्री बताती हैं कि स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए कठिन परिस्थितियों में भी साहस और दृढ़ता बनाए रखनी चाहिए। उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों को अन्याय के सामने न झुकने और अपने स्वाभिमान की रक्षा करने की प्रेरणा देता है।
↑ ऊपर जाएँ4. झाँसी की रानी – काव्यांशों की व्याख्या
नीचे कविता के सभी 18 काव्यांशों की मूल पंक्तियाँ, कठिन शब्दार्थ और उनकी सरल व्याख्या दी गई है:
बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी,
चमक उठी सन सत्तावन में वह तलवार पुरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
सिंहासन – राजसत्ता/राजा का आसन; राजवंश – राजाओं के कुल; भृकुटी तानी – क्रोध प्रकट किया; फिरंगी – अंग्रेज; हरबोले – बुंदेलखंड के लोकगायक; मर्दानी – वीर एवं साहसी।
💡 व्याख्या
कवयित्री 1857 की क्रांति के वातावरण का वर्णन करती हैं। अंग्रेजी शासन के विरुद्ध भारतीय राजाओं और जनता में असंतोष बढ़ चुका था। लंबे समय से गुलामी सह रहे भारत में स्वतंत्रता प्राप्त करने का नया उत्साह जागा। लोगों ने अपनी खोई हुई आज़ादी का मूल्य पहचाना और अंग्रेजों को देश से बाहर करने का निश्चय किया। इसी समय रानी लक्ष्मीबाई की वीरता पूरे तेज के साथ सामने आई।
लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,
नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,
बरछी, ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी,
वीर शिवाजी की गाथाएँ उसको याद ज़बानी थीं।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
मुँहबोली बहन – जिसे बहन मान लिया गया हो; छबीली – सुंदर, सजीली और तेजस्वी; बरछी – छोटा भाला; कृपाण – तलवार; कटारी – छोटा धारदार हथियार; गाथा – वीरता की कथा; ज़बानी – मुँह से याद।
💡 व्याख्या
इस काव्यांश में लक्ष्मीबाई के बचपन का वर्णन है। वे नाना साहब की मुँहबोली बहन थीं और ‘छबीली’ कहलाती थीं। सामान्य बालिकाओं के खेलों के स्थान पर अस्त्र-शस्त्र उनके प्रिय साथी थे। वीर शिवाजी की गाथाएँ उन्हें याद थीं। इससे उनके बचपन से ही साहसी, निर्भीक और वीर स्वभाव का पता चलता है।
देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,
नकली युद्ध, व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,
सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवाड़,
महाराष्ट्र-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
अवतार – साकार रूप; पुलकित – प्रसन्न और रोमांचित; व्यूह – युद्ध के लिए सेना की योजनाबद्ध रचना; सैन्य – सेना; दुर्ग – किला; आराध्य – जिसकी उपासना की जाए; भवानी – देवी दुर्गा।
💡 व्याख्या
कवयित्री लक्ष्मीबाई को वीरता का साक्षात रूप बताती हैं। तलवार चलाना, नकली युद्ध करना, व्यूह बनाना, शिकार खेलना, सेना को घेरना और दुर्ग जीतना उनके प्रिय खेल थे। वे भवानी की उपासना करती थीं। उनके व्यक्तित्व में बचपन से ही एक कुशल योद्धा के गुण विकसित हो चुके थे।
ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,
राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाईं झाँसी में,
सुभट बुंदेलों की विरुदावलि-सी वह आई झाँसी में,
चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
वैभव – ऐश्वर्य; ब्याह – विवाह; सुभट – वीर योद्धा; विरुदावलि – यश और प्रशंसा का गान; भवानी – देवी पार्वती।
💡 व्याख्या
लक्ष्मीबाई का विवाह झाँसी के राजा से हुआ और वे झाँसी की रानी बनकर राजमहल आईं। उनके आगमन से पूरे झाँसी में प्रसन्नता छा गई। कवयित्री इस विवाह को वीरता और वैभव का सुंदर मिलन मानती हैं और इसे गौरवपूर्ण रूप में प्रस्तुत करती हैं।
किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,
तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाईं,
रानी विधवा हुई हाय! विधि को भी नहीं दया आई,
निःसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
उदित – प्रकट; मुदित – प्रसन्न; कालगति – समय/भाग्य की गति; कर – हाथ; विधि – भाग्य; निःसंतान – जिसकी संतान न हो; शोक-समानी – शोक में डूबी हुई।
💡 व्याख्या
विवाह के बाद रानी के जीवन में सुख आया, पर यह अधिक समय तक नहीं रहा। राजा की मृत्यु हो गई और रानी विधवा हो गईं। कवयित्री काली घटा के माध्यम से आने वाले दुःख का संकेत करती हैं। युद्ध के लिए बने रानी के हाथों को चूड़ियाँ स्वीकार नहीं थीं; उनका स्वभाव कर्मशील और वीर था।
राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,
फौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,
लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया,
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
बुझा दीप – राजा की मृत्यु और संकट का संकेत; हरषाया – प्रसन्न हुआ; हड़पना – जबरन अधिकार करना; दुर्ग – किला; लावारिस – जिसका कोई वारिस न हो; अश्रुपूर्ण – आँसुओं से भरा; बिरानी – उजड़ी/सूनी।
💡 व्याख्या
राजा की मृत्यु के बाद डलहौजी ने झाँसी पर अधिकार करने का अवसर देखा। अंग्रेजी सेना ने किले पर अपना झंडा फहरा दिया और ब्रिटिश शासन ने स्वयं को झाँसी का वारिस मान लिया। अपनी झाँसी की ऐसी दशा देखकर रानी अत्यंत दुःखी हुईं।
व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,
डलहौजी ने पैर पसारे अब तो पलट गई काया,
राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया,
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महारानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
अनुनय-विनय – प्रार्थना और निवेदन; विकट – कठिन/भयंकर; माया – छल-कपट; पैर पसारना – प्रभाव बढ़ाना; काया पलटना – स्थिति पूरी तरह बदलना; ठुकराना – अपमानपूर्वक अस्वीकार करना।
💡 व्याख्या
अंग्रेज भारत में व्यापारी बनकर आए थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपनी राजनीतिक शक्ति बढ़ा ली। डलहौजी के समय उनकी स्थिति इतनी मजबूत हो गई कि वे भारतीय राजाओं और नवाबों का भी अपमान करने लगे। कवयित्री अंग्रेजी सत्ता के इसी बदले हुए रूप को सामने रखती हैं।
कैद पेशवा था बिठूर में, हुआ नागपुर का भी घात,
उदैपुर, तंजोर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात,
जबकि सिंध, पंजाब, ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात,
बंगाले, मद्रास आदि की भी तो यही कहानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
घात – आघात/विनाश; बिसात – सामर्थ्य या हैसियत; वज्र-निपात – बहुत बड़ा आघात; कैद – बंदी।
💡 व्याख्या
अंग्रेजों ने धीरे-धीरे अनेक भारतीय राज्यों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। दिल्ली, लखनऊ, नागपुर, सतारा, पंजाब आदि की ओर संकेत करके कवयित्री बताती हैं कि झाँसी पर आया संकट अकेली घटना नहीं था, बल्कि अंग्रेजों की विस्तारवादी नीति का हिस्सा था।
उनके गहने-कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाजार,
सरेआम नीलाम छापते थे अंग्रेजों के अखबार,
‘नागपुर के जेवर ले लो’ ‘लखनऊ के लो नौलखा हार’,
यों پرदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
रनिवास – राजमहल का रानियों का भाग; बेजार – अत्यंत दुःखी; सरेआम – सबके सामने; नीलाम – बोली लगाकर बेचना; नौलखा हार – अत्यंत मूल्यवान हार।
💡 व्याख्या
अंग्रेजी शासन में भारतीय राजपरिवारों को गहरा अपमान सहना पड़ा। रानियों और बेगमों के बहुमूल्य गहने-कपड़े तक बाजार में बेचे जा रहे थे। यह केवल संपत्ति की हानि नहीं थी, बल्कि उनके सम्मान पर भी आघात था। इससे अंग्रेजों के विरुद्ध असंतोष और तीव्र हुआ।
वीर सैनिकों के मन में था, अपने पुरखों का अभिमान,
नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,
बहिन छबीली ने रण-चंडी का कर दिया प्रकट आह्वान,
हुआ यज्ञ प्रारंभ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
कुटियाँ – झोपड़ियाँ; विषम वेदना – अत्यधिक पीड़ा; आहत – चोट पहुँचा हुआ; पुरखे – पूर्वज; रण-चंडी – युद्ध में शक्ति का रूप; आह्वान – पुकार; ज्योति जगाना – चेतना उत्पन्न करना।
💡 व्याख्या
अंग्रेजों के अत्याचार से सामान्य जनता और राजघराने दोनों पीड़ित थे। सैनिकों में अपने वीर पूर्वजों का गौरव जाग रहा था। नाना साहब विद्रोह की तैयारी कर रहे थे और लक्ष्मीबाई ने भी संघर्ष का आह्वान कर दिया। स्वतंत्रता की सोई चेतना अब जागने लगी थी।
यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,
झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थीं,
मेरठ, कानपुर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,
जबलपुर, कोल्हापुर में भी कुछ हलचल उकसानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
ज्वाला – आग की लपट; चिनगारी – यहाँ विद्रोह की शुरुआत; अंतरतम – हृदय की गहराई; चेती – जाग उठी; लपट – आग की लौ; धूम मचाना – व्यापक हलचल पैदा करना।
💡 व्याख्या
स्वतंत्रता की भावना राजमहलों तक सीमित नहीं रही; सामान्य जनता भी अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उठ खड़ी हुई। झाँसी, दिल्ली, लखनऊ, मेरठ, कानपुर, पटना, जबलपुर और कोल्हापुर जैसे स्थानों में विद्रोह की लहर फैल गई। 1857 का संघर्ष व्यापक रूप लेने लगा।
नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,
अहमद शाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,
भारत के इतिहास-गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम,
लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
महायज्ञ – यहाँ महान स्वतंत्रता-संग्राम; वीरवर – महान वीर; सरनाम – प्रसिद्ध; अभिराम – श्रेष्ठ/मनभावन; इतिहास-गगन – इतिहास रूपी आकाश; कुरबानी – बलिदान।
💡 व्याख्या
1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीरों ने अपना जीवन बलिदान किया। नाना धुंधूपंत, ताँतिया, अज़ीमुल्ला, अहमद शाह मौलवी और कुँवरसिंह जैसे योद्धाओं के नाम इतिहास में अमर हैं। कवयित्री उनके संघर्ष और बलिदान का सम्मान करती हैं।
जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,
लेफ्टिनेंट वॉकर आ पहुँचा, आगे बढ़ा जवानों में,
रानी ने तलवार खींच ली, हुआ द्वंद्व असमानों में,
जख्मी होकर वॉकर भागा, उसे अजब हैरानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
गाथा – वीरता की कथा; द्वंद्व – दो पक्षों का युद्ध; जख्मी – घायल; हैरानी – आश्चर्य।
💡 व्याख्या
अन्य क्रांतिकारियों के उल्लेख के बाद कवयित्री फिर झाँसी के युद्ध की ओर लौटती हैं। लेफ्टिनेंट वॉकर सेना के साथ आगे बढ़ता है, लेकिन रानी तलवार खींचकर उसका सामना करती हैं। युद्ध में वॉकर घायल होकर पीछे हटता है। यह रानी की युद्ध-कुशलता और साहस को दिखाता है।
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर, गया स्वर्गतत्काल सिधार,
यमुना-तट पर अंग्रेजों ने फिर खाई रानी से हार,
विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार,
अंग्रेजों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
निरंतर – लगातार; भूमि – धरती; सिधार – मृत्यु को प्राप्त होना; यमुना-तट – यमुना नदी का किनारा; विजयी – विजय पाने वाली।
💡 व्याख्या
रानी लगभग सौ मील की यात्रा कर कालपी पहुँचीं। लंबी यात्रा से उनका घोड़ा थककर गिर गया। कठिन परिस्थिति के बावजूद रानी ने संघर्ष नहीं छोड़ा। अंग्रेजों को पराजित करते हुए वे आगे बढ़ीं और ग्वालियर पर अधिकार कर लिया।
अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुँह की खाई थी,
काना और मंदरा सखियाँ रानी के सँग आई थीं,
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी,
पर, पीछे ह्यू रोज आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
सम्मुख – सामने; मुँह की खाना – पराजित होना; सखियाँ – सहेलियाँ; युद्ध-क्षेत्र – युद्ध का मैदान; घिरना – चारों ओर से शत्रुओं से घिर जाना।
💡 व्याख्या
ग्वालियर की विजय के बाद अंग्रेजी सेना ने पुनः रानी पर आक्रमण किया। जनरल स्मिथ को रानी के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। काना और मंदरा ने भी रानी के साथ वीरतापूर्वक युद्ध किया। बाद में ह्यू रोज के आने से रानी चारों ओर से घिर गईं।
किंतु सामने नाला आया, था यह संकट विषम अपार,
घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गए सवार,
रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार,
घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर-गति पानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
सैन्य – सेना; विषम – अत्यंत कठिन; शत्रु – दुश्मन; सिंहनी – शेरनी, यहाँ वीर रानी के लिए; वीर-गति – युद्ध करते हुए वीर की मृत्यु।
💡 व्याख्या
चारों ओर से घिरने पर भी रानी ने हार नहीं मानी। वे शत्रु सेना को काटती हुई आगे बढ़ीं। सामने नाला आने पर नया घोड़ा अड़ गया और अंग्रेज सैनिक पहुँच गए। अकेली रानी ने अनेक शत्रुओं का सामना किया। अंततः घायल होकर वे वीरगति को प्राप्त हुईं।
मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,
अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,
हमको जीवित करने आई बन स्वतंत्रता नारी थी,
दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
सिधार – मृत्यु को प्राप्त होना; चिता – दाह-संस्कार के लिए लकड़ियों की रचना; दिव्य – महान/अलौकिक; तेज – ओज और गौरव; मनुज – मनुष्य; पथ – मार्ग।
💡 व्याख्या
रानी वीरगति को प्राप्त हुईं। वे केवल तेईस वर्ष की थीं, फिर भी उन्होंने असाधारण साहस दिखाया। कवयित्री उन्हें स्वतंत्रता की प्रेरक नारी के रूप में देखती हैं। रानी ने अपने जीवन और बलिदान से आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने का मार्ग दिखाया।
यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशी,
होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,
हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी,
तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी।
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी।
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी॥
📝 शब्दार्थ
कृतज्ञ – उपकार मानने वाला; बलिदान – महान उद्देश्य के लिए जीवन समर्पण; अविनाशी – जिसका नाश न हो; मदमाती विजय – विजय के घमंड में चूर सत्ता; स्मारक – स्मृति-चिह्न; अमिट – जिसे मिटाया न जा सके।
💡 व्याख्या
अंतिम काव्यांश में कवयित्री रानी को श्रद्धांजलि देती हैं। भारतवासी उनके बलिदान को सदैव याद रखेंगे। इतिहास मौन हो जाए या झाँसी नष्ट कर दी जाए, फिर भी रानी की वीरता नहीं मिट सकती। उनका जीवन स्वयं उनका सबसे बड़ा स्मारक और अमिट निशानी है।
5. FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
‘झाँसी की रानी’ कविता की कवयित्री कौन हैं?
‘झाँसी की रानी’ कविता की कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान हैं।
‘झाँसी की रानी’ कविता किस ऐतिहासिक घटना की पृष्ठभूमि पर आधारित है?
यह कविता 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
कविता में लक्ष्मीबाई के बचपन का नाम क्या बताया गया है?
कविता में लक्ष्मीबाई को बचपन में ‘छबीली’ कहा गया है।
रानी लक्ष्मीबाई के प्रिय खेल किस प्रकार के थे?
उन्हें नकली युद्ध, व्यूह-रचना, शिकार, सेना को घेरना और दुर्ग तोड़ना जैसे युद्ध-कौशल से जुड़े खेल प्रिय थे।
‘झाँसी की रानी’ कविता का मुख्य संदेश क्या है?
कविता देशप्रेम, स्वतंत्रता, साहस, स्वाभिमान और बलिदान की प्रेरणा देती है।
कवयित्री ने रानी लक्ष्मीबाई को अमर क्यों माना है?
रानी ने स्वतंत्रता के लिए अद्भुत साहस के साथ संघर्ष किया और अपना जीवन बलिदान कर दिया। उनका यही वीरतापूर्ण जीवन उनकी अमिट निशानी बन गया।
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