Class 10 Hindi • स्पर्श भाग–2 • आत्मत्राण कविता

आत्मत्राण कविता – सारांश, शब्दार्थ, व्याख्या और NCERT प्रश्नोत्तर

यदि आप आत्मत्राण कविता का सारांश, कठिन शब्दों के अर्थ, प्रत्येक काव्यांश की सरल व्याख्या और परीक्षा के लिए उपयोगी NCERT प्रश्नोत्तर व MCQ खोज रहे हैं, तो इस लेख में पूरा पाठ क्रमबद्ध और आसान भाषा में दिया गया है। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की यह कविता हमें विपत्तियों से बचने की नहीं, बल्कि उनका निर्भय होकर सामना करने के लिए आत्मबल और साहस प्राप्त करने की प्रेरणा देती है।

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01 पाठ परिचय

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‘आत्मत्राण’ रवीन्द्रनाथ ठाकुर की एक प्रेरणादायक प्रार्थना-कविता है। सामान्यतः मनुष्य संकट आने पर ईश्वर से उसे दूर करने की प्रार्थना करता है, लेकिन इस कविता में कवि की प्रार्थना बिल्कुल अलग है। वह ईश्वर से विपत्तियाँ हटाने की माँग नहीं करता, बल्कि उनका सामना करने का साहस माँगता है।

कवि चाहता है कि कठिन परिस्थितियों में उसका मन भयभीत न हो। दुःख मिलने पर वह टूटे नहीं, किसी सहायक के न मिलने पर उसका आत्मबल कम न हो और संसार में हानि होने पर भी वह अपने आपको पराजित न समझे।

कविता मनुष्य को आत्मनिर्भरता, साहस, धैर्य, आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास का संदेश देती है। कवि की दृष्टि में सच्ची प्रार्थना वह है जिसमें व्यक्ति कठिनाइयों को दूर करने की अपेक्षा उनसे संघर्ष करने की शक्ति माँगे।

02 कवि परिचय

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रवीन्द्रनाथ ठाकुर का चित्र यहाँ लगाएँ

रवीन्द्रनाथ ठाकुर आधुनिक भारतीय साहित्य के महान कवि, लेखक, दार्शनिक, शिक्षाविद् और संगीतकार थे। उनका जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था। साहित्य जगत में उन्हें ‘गुरुदेव’ के नाम से भी जाना जाता है।

उनकी रचनाओं में मानवता, प्रकृति, प्रेम, स्वतंत्रता, अध्यात्म और जीवन-मूल्यों का सुंदर समन्वय मिलता है। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें वर्ष 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भाषा भावपूर्ण, संवेदनशील और दार्शनिक है। उनकी कविताएँ केवल भावनाओं को व्यक्त नहीं करतीं, बल्कि पाठक को अपने जीवन और विचारों पर गंभीरता से सोचने के लिए भी प्रेरित करती हैं।

प्रमुख रचनाएँ: गीतांजलि, गोरा, घरे-बाइरे, डाकघर आदि।

03 पाठ का सारांश

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‘आत्मत्राण’ कविता का मूल भाव आत्मबल और निर्भयता है। कवि ईश्वर से कहता है कि वह उसे जीवन में आने वाली विपत्तियों से बचाने की प्रार्थना नहीं करता। उसकी इच्छा केवल इतनी है कि विपत्ति आने पर उसके मन में भय उत्पन्न न हो। वह चाहता है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा हो, उसका मन साहस और विश्वास से भरा रहे।

कवि आगे कहता है कि यदि दुःख और पीड़ा से उसका मन व्याकुल हो जाए तो ईश्वर उसे सांत्वना न भी दे, फिर भी उसे कोई शिकायत नहीं होगी। वह केवल इतनी शक्ति चाहता है कि वह स्वयं अपने दुःख पर विजय प्राप्त कर सके। यहाँ कवि बाहरी सहायता से अधिक आंतरिक शक्ति को महत्त्व देता है।

जीवन में कई बार ऐसा समय भी आ सकता है जब कोई व्यक्ति सहायता करने के लिए उपस्थित न हो। कवि चाहता है कि ऐसी परिस्थिति में उसका साहस और पुरुषार्थ न डगमगाए। यदि संसार में उसे हानि उठानी पड़े और अपेक्षित लाभ न मिले, तब भी वह अपने मन में स्वयं को कमजोर या पराजित न समझे।

कवि ईश्वर से प्रतिदिन रक्षा करने की माँग भी नहीं करता। वह चाहता है कि उसे जीवनरूपी कठिन सागर को अपने आत्मबल से पार करने की शक्ति मिले। इसी प्रकार वह अपने जीवन का भार कम करने की भी प्रार्थना नहीं करता; बल्कि इतनी सामर्थ्य चाहता है कि वह उस भार को बिना डरे स्वयं उठा सके।

कविता के अंतिम भाग में कवि सुख और दुःख दोनों परिस्थितियों में ईश्वर के प्रति विश्वास बनाए रखने की कामना करता है। सुख के समय वह विनम्र रहकर ईश्वर को याद करे और दुःख की अंधेरी रात में, जब पूरा संसार भी उसका साथ छोड़ दे, तब भी उसके मन में ईश्वर के प्रति कोई संदेह उत्पन्न न हो।

इस प्रकार पूरी कविता मनुष्य को यह संदेश देती है कि सच्ची प्रार्थना केवल संकटों को दूर करने के लिए नहीं, बल्कि संकटों का सामना करने की क्षमता, साहस, धैर्य और आत्मविश्वास प्राप्त करने के लिए होनी चाहिए।

04 सभी काव्यांश – शब्दार्थ एवं व्याख्या

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काव्यांश 1

विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं
केवल इतना हो (करुणामय)
कभी न विपदा में पाऊँ भय।

शब्दार्थ

विपदाओं — संकटों, कठिनाइयों; प्रार्थना — विनती; करुणामय — दया और करुणा से पूर्ण ईश्वर; विपदा — संकट, मुसीबत; भय — डर।

व्याख्या

कवि ईश्वर से यह प्रार्थना नहीं करता कि वह उसे जीवन में आने वाली सभी विपत्तियों से बचा ले। वह केवल इतना चाहता है कि जब कोई कठिन परिस्थिति आए तो उसके मन में भय उत्पन्न न हो। वह संकटों से भागने की जगह उनका साहसपूर्वक सामना करने की शक्ति चाहता है। इन पंक्तियों में कवि निर्भयता और आत्मबल को जीवन की सबसे बड़ी शक्ति मानता है।

काव्यांश 2

दुःख-ताप से व्यथित चित्त को न दो सांत्वना नहीं सही
पर इतना होवे (करुणामय)
दुख को मैं कर सकूँ सदा जय।

शब्दार्थ

दुःख-ताप — दुःख और कष्ट; व्यथित — पीड़ित, दुखी; चित्त — मन; सांत्वना — दिलासा; जय करना — विजय प्राप्त करना।

व्याख्या

कवि कहता है कि जब उसका मन दुःख और पीड़ा से व्याकुल हो, तब ईश्वर उसे सांत्वना न भी दे तो वह स्वीकार है। उसकी प्रार्थना केवल इतनी है कि उसे ऐसा आत्मबल मिले जिससे वह अपने दुःख पर स्वयं विजय प्राप्त कर सके। कवि यहाँ कठिन समय में केवल सहारा पाने की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि संघर्ष करने की शक्ति चाहता है।

काव्यांश 3

कोई कहीं सहायक न मिले
तो अपना बल पौरुष न हिले;
हानि उठानी पड़े जगत में लाभ अगर वंचना रही
तो भी मन में ना मानूँ क्षय॥

शब्दार्थ

सहायक — सहायता करने वाला; बल — शक्ति; पौरुष — साहस, पुरुषार्थ; हानि — नुकसान; जगत — संसार; लाभ — फायदा; वंचना — किसी लाभ से वंचित रह जाना; क्षय — कमी, हानि, पतन।

व्याख्या

कवि चाहता है कि जीवन में यदि उसे किसी व्यक्ति का सहारा न मिले तब भी उसका अपना साहस और पुरुषार्थ कमजोर न पड़े। संसार में उसे हानि उठानी पड़े या वह अपेक्षित लाभ से वंचित रह जाए, तब भी वह अपने मन में स्वयं को पराजित न समझे। उसका विश्वास और आत्मबल कठिन परिस्थितियों में भी अडिग बना रहे। इन पंक्तियों में आत्मनिर्भरता और दृढ़ इच्छाशक्ति का भाव व्यक्त हुआ है।

काव्यांश 4

मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
बस इतना होवे (करुणामय)
तरने की हो शक्ति अनामय।

शब्दार्थ

त्राण — रक्षा, उद्धार; अनुदिन — प्रतिदिन; तरने — पार करने; अनामय — रोग या दुर्बलता से रहित, स्वस्थ एवं अक्षुण्ण; करुणामय — दयालु ईश्वर।

व्याख्या

कवि ईश्वर से यह नहीं चाहता कि वह हर दिन उसकी रक्षा करता रहे और प्रत्येक समस्या से उसे स्वयं बचा ले। उसकी प्रार्थना है कि उसे ऐसी शक्ति मिले जिससे वह जीवन की कठिनाइयों को अपने साहस और सामर्थ्य से पार कर सके। यहाँ कवि सुरक्षा की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि स्वयं संघर्ष करने की क्षमता माँगता है।

काव्यांश 5

मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
केवल इतना रखना अनुनय—
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।

शब्दार्थ

भार — बोझ, जिम्मेदारी या कठिनाई; लघु — हल्का; अनुनय — विनम्र प्रार्थना; वहन — उठाना, सहन करना; निर्भय — बिना डरे।

व्याख्या

कवि ईश्वर से अपने जीवन का भार या जिम्मेदारियाँ कम करने की प्रार्थना नहीं करता। यदि उसका भार हल्का न किया जाए तो भी उसे कोई शिकायत नहीं है। वह केवल इतनी शक्ति चाहता है कि जीवन में जो दायित्व और कठिनाइयाँ उसे मिली हैं, वह उन्हें बिना भय के स्वयं वहन कर सके। कवि की दृष्टि में कठिनाइयों से छुटकारा पाने से अधिक महत्वपूर्ण है उन्हें सहने की क्षमता प्राप्त करना।

काव्यांश 6

नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय॥

शब्दार्थ

नत शिर — सिर झुकाकर; तव — तुम्हारा; मुख — स्वरूप; छिन-छिन — प्रत्येक क्षण; दुःख-रात्रि — अत्यंत दुःख का समय; वंचना — साथ छोड़ देना, निराश करना; निखिल मही — संपूर्ण संसार या पृथ्वी; संशय — संदेह।

व्याख्या

कवि चाहता है कि सुख के दिनों में भी वह अहंकार से दूर रहे और सिर झुकाकर प्रत्येक क्षण ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करता रहे। वह केवल दुःख के समय ही ईश्वर को याद न करे, बल्कि सुख में भी उसके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा बनाए रखे।

साथ ही कवि प्रार्थना करता है कि जब दुःख की ऐसी घड़ी आए जिसमें पूरा संसार उसका साथ छोड़ दे, तब भी उसके मन में ईश्वर के प्रति संदेह न उत्पन्न हो। वह हर परिस्थिति में अपनी आस्था और विश्वास को अटूट रखना चाहता है।

05 पाठ से सीख

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‘आत्मत्राण’ कविता मनुष्य को जीवन की समस्याओं से भागने के बजाय उनका साहसपूर्वक सामना करना सिखाती है। कवि का संदेश है कि व्यक्ति को दूसरों के सहारे पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहना चाहिए। उसके भीतर इतना आत्मविश्वास होना चाहिए कि कठिन समय में भी वह अपने कर्तव्य-पथ से न हटे।

  • विपत्तियों से डरने के बजाय उनका सामना करना चाहिए।
  • दुःख में धैर्य और आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए।
  • सहायता न मिलने पर भी अपना पुरुषार्थ नहीं छोड़ना चाहिए।
  • हानि और असफलता को जीवन की अंतिम पराजय नहीं मानना चाहिए।
  • अपने दायित्वों को निर्भय होकर निभाना चाहिए।
  • सुख और दुःख दोनों में विनम्रता तथा ईश्वर के प्रति विश्वास बनाए रखना चाहिए।

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केंद्रीय भाव: कवि विपत्तियों को दूर करने की नहीं, बल्कि उनका सामना करने के लिए साहस और आत्मबल की प्रार्थना करता है।

कवि की विशेष प्रार्थना: दुःख दूर न हो तो भी उसे सहने और उस पर विजय पाने की शक्ति बनी रहे।

‘आत्मत्राण’ शीर्षक: शीर्षक मनुष्य के अपने आत्मबल, साहस और विश्वास द्वारा संकटों से पार पाने की भावना को व्यक्त करता है।

महत्वपूर्ण मूल्य: आत्मनिर्भरता, निर्भयता, पुरुषार्थ, धैर्य, विनम्रता और अटूट आस्था।

सबसे महत्वपूर्ण अंतर: कवि ईश्वर से समस्याएँ हटाने की माँग नहीं करता; वह समस्याओं को सहने और उनसे लड़ने की शक्ति माँगता है।

अंतिम भाव: जब संपूर्ण संसार भी साथ छोड़ दे, तब भी ईश्वर के प्रति विश्वास में संशय न आए।

06 अभ्यास प्रश्न

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NCERT प्रश्नोत्तर

प्रश्न 1. कवि किससे और क्या प्रार्थना कर रहा है?

उत्तर: कवि करुणामय ईश्वर से प्रार्थना कर रहा है। वह अपने जीवन से विपत्तियाँ और दुःख दूर करने की प्रार्थना नहीं करता, बल्कि उनसे निर्भय होकर संघर्ष करने का साहस, आत्मबल और धैर्य माँगता है।

प्रश्न 2. ‘विपदाओं से मुझे बचाओ, यह मेरी प्रार्थना नहीं’—कवि इस पंक्ति के द्वारा क्या कहना चाहता है?

उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि कवि जीवन की कठिनाइयों से बचना नहीं चाहता। वह चाहता है कि विपत्ति आने पर उसके मन में भय न हो और वह अपनी शक्ति तथा आत्मविश्वास से उसका सामना कर सके।

प्रश्न 3. कवि सहायक के न मिलने पर क्या प्रार्थना करता है?

उत्तर: कवि प्रार्थना करता है कि यदि उसे किसी का सहारा न मिले तो भी उसका अपना बल और पुरुषार्थ कमजोर न पड़े। वह कठिन परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास बनाए रखे और अपने प्रयास से आगे बढ़ता रहे।

प्रश्न 4. अंत में कवि क्या अनुनय करता है?

उत्तर: अंत में कवि ईश्वर से विनती करता है कि सुख के दिनों में वह विनम्र रहकर उन्हें याद करता रहे और दुःख के समय, जब पूरा संसार भी उसका साथ छोड़ दे, तब भी उसके मन में ईश्वर के प्रति कोई संशय न हो।

प्रश्न 5. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक की सार्थकता कविता के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

उत्तर: ‘आत्मत्राण’ का भाव स्वयं अपने आत्मबल से संकटों से पार पाने से है। कविता में कवि बाहरी सुरक्षा के बजाय अपने भीतर साहस, धैर्य, निर्भयता और संघर्ष करने की शक्ति चाहता है। इसलिए कविता का ‘आत्मत्राण’ शीर्षक उसके केंद्रीय भाव को स्पष्ट करता है और पूरी तरह सार्थक है।

प्रश्न 6. अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आप प्रार्थना के अतिरिक्त और क्या-क्या प्रयास करते हैं?

उत्तर: अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मैं स्पष्ट लक्ष्य बनाता हूँ, नियमित परिश्रम करता हूँ, समय का सही उपयोग करता हूँ और अपनी गलतियों से सीखने का प्रयास करता हूँ। आवश्यकता पड़ने पर अनुभवी लोगों से मार्गदर्शन लेकर धैर्य और आत्मविश्वास के साथ लगातार प्रयास करता हूँ।

प्रश्न 7. क्या कवि की यह प्रार्थना आपको अन्य प्रार्थना गीतों से अलग लगती है? यदि हाँ, तो कैसे?

उत्तर: हाँ, यह प्रार्थना अन्य सामान्य प्रार्थनाओं से अलग है। इसमें कवि ईश्वर से दुःख, संकट या जिम्मेदारियाँ दूर करने की माँग नहीं करता। वह उन कठिनाइयों का सामना करने के लिए आत्मबल, निर्भयता और धैर्य चाहता है। यही भावना इसे विशेष बनाती है।

20 महत्वपूर्ण बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

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1. ‘आत्मत्राण’ कविता के कवि कौन हैं?

A. कबीरदास B. मैथिलीशरण गुप्त C. सुमित्रानंदन पंत D. रवीन्द्रनाथ ठाकुर

2. कविता में ‘करुणामय’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?

A. मित्र B. सहायक C. मनुष्य D. ईश्वर

3. कवि विपदा में क्या नहीं पाना चाहता?

A. लाभ B. सम्मान C. भय D. सहायता

4. दुःख-ताप से व्यथित चित्त को क्या न भी मिले तो कवि स्वीकार करता है?

A. धन B. यश C. पुरस्कार D. सांत्वना

5. कोई सहायक न मिलने पर कवि चाहता है कि उसका क्या न हिले?

A. शरीर B. बल और पौरुष C. धन D. स्थान

6. लाभ से वंचित होने पर भी कवि मन में क्या नहीं मानना चाहता?

A. उत्साह B. क्षय C. प्रेम D. सफलता

7. ‘त्राण’ शब्द का अर्थ क्या है?

A. दुःख B. भय C. भार D. रक्षा या उद्धार

8. ‘अनुदिन’ शब्द का सही अर्थ क्या है?

A. प्रतिदिन B. कभी-कभी C. रात्रि में D. भविष्य में

9. ‘अनामय’ का अर्थ है—

A. अत्यंत दुखी B. भयभीत C. रोग या दुर्बलता से रहित D. असहाय

10. कवि अपना भार हल्का कराने के बजाय क्या चाहता है?

A. निर्भय होकर भार वहन करना B. भार किसी और को देना C. जिम्मेदारी छोड़ देना D. संसार से दूर चले जाना

11. ‘नत शिर’ का अर्थ क्या है?

A. सिर झुकाकर B. आँख बंद करके C. हाथ जोड़कर D. चुप रहकर

12. सुख के दिनों में कवि प्रत्येक क्षण किसे पहचानना चाहता है?

A. ईश्वर के स्वरूप को B. संसार की शक्ति को C. अपने मित्र को D. अपने शत्रु को

13. दुःख की घड़ी में कवि किस पर संशय नहीं करना चाहता?

A. अपने मित्रों पर B. ईश्वर पर C. संसार पर D. धन पर

14. ‘आत्मत्राण’ कविता का प्रमुख भाव क्या है?

A. भौतिक सुख की इच्छा B. आत्मबल और निर्भयता C. प्रकृति-सौंदर्य D. युद्ध का वर्णन

15. ‘आत्मत्राण’ शीर्षक मुख्य रूप से किस ओर संकेत करता है?

A. दूसरों से सुरक्षा पाना B. संसार का त्याग करना C. आत्मबल द्वारा स्वयं संकटों से पार पाना D. धन अर्जित करना

16. कवि ईश्वर से क्या नहीं माँगता?

A. सभी विपत्तियों को समाप्त कर देना B. साहस C. आत्मबल D. निर्भयता

17. कवि सुख और दुःख दोनों परिस्थितियों में क्या बनाए रखना चाहता है?

A. ईश्वर के प्रति विश्वास B. धन की इच्छा C. विजय का अहंकार D. दूसरों पर निर्भरता

18. ‘पौरुष’ शब्द का अर्थ है—

A. दुःख B. विनम्रता C. साहस और पुरुषार्थ D. भय

19. ‘निखिल मही’ का अर्थ क्या है?

A. संपूर्ण संसार B. एक नगर C. पर्वत D. नदी

20. ‘आत्मत्राण’ को किस प्रकार की प्रार्थना कहा जा सकता है?

A. धन प्राप्ति की प्रार्थना B. संकटों से भागने की प्रार्थना C. कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति माँगने वाली प्रार्थना D. प्रसिद्धि पाने की प्रार्थना

07 FAQ's – आत्मत्राण

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1. आत्मत्राण कविता के कवि कौन हैं?

‘आत्मत्राण’ कविता के कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं। उनकी रचनाओं में मानवता, अध्यात्म, प्रकृति और जीवन-मूल्यों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है।

2. आत्मत्राण कविता का मुख्य भाव क्या है?

कविता का मुख्य भाव यह है कि मनुष्य को विपत्तियों से बचने की अपेक्षा उनका सामना करने के लिए साहस, आत्मबल, धैर्य और निर्भयता प्राप्त करनी चाहिए।

3. कवि ईश्वर से क्या प्रार्थना करता है?

कवि ईश्वर से कठिनाइयाँ दूर करने की प्रार्थना नहीं करता। वह चाहता है कि उसे दुःख और संकटों का सामना करने तथा उन पर विजय पाने की शक्ति मिले।

4. ‘आत्मत्राण’ शब्द का अर्थ क्या है?

‘आत्मत्राण’ का भाव अपने आत्मबल द्वारा स्वयं को संकट, भय और दुर्बलता से बचाने तथा कठिनाइयों से पार पाने से है।

5. ‘अनामय’ शब्द का अर्थ क्या है?

‘अनामय’ का अर्थ रोग या दुर्बलता से रहित, स्वस्थ और अक्षुण्ण होता है।

6. कवि अपना भार हल्का क्यों नहीं कराना चाहता?

कवि जिम्मेदारियों से बचना नहीं चाहता। वह इतनी शक्ति चाहता है कि अपने जीवन का भार और दायित्व स्वयं निर्भय होकर उठा सके।

7. यह प्रार्थना अन्य प्रार्थनाओं से अलग कैसे है?

इसमें कवि सुख-सुविधा या समस्याओं से मुक्ति नहीं माँगता। वह कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास चाहता है।

8. बोर्ड परीक्षा के लिए आत्मत्राण से क्या-क्या याद रखना चाहिए?

कविता का केंद्रीय भाव, आत्मत्राण शीर्षक की सार्थकता, कवि की विशेष प्रार्थना, ‘त्राण’, ‘अनामय’, ‘पौरुष’, ‘निखिल मही’ जैसे शब्दार्थ तथा सुख-दुःख दोनों में ईश्वर पर विश्वास बनाए रखने का संदेश विशेष रूप से याद रखना उपयोगी है।