क्या लिखूँ?
मुख्य विषय: निबंध लेखन की प्रक्रिया, लेखन की कठिनाई, अनुभव-आधारित लेखन, समाज-सुधार और “दूर के ढोल सुहावने” लोकोक्ति का अर्थ।
CONTENT
पाठ का परिचय
पाठ का नाम: क्या लिखूँ?
लेखक: पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
विधा: निबंध
मुख्य विषय: निबंध लेखन की प्रक्रिया, लेखन की कठिनाई, अनुभव-आधारित लेखन, समाज-सुधार और “दूर के ढोल सुहावने” लोकोक्ति का अर्थ।
इस निबंध में लेखक ने निबंध लिखने की प्रक्रिया को बहुत रोचक और आत्मीय शैली में समझाया है। लेखक को दो विषयों— “दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार”—पर निबंध लिखना है। इन्हीं दो विषयों के बहाने लेखक निबंध-लेखन की कठिनाइयों, आदर्श निबंध की विशेषताओं, शैली, रूपरेखा, अनुभव और विचारों की भूमिका पर चर्चा करते हैं।
लेखक परिचय
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार, आलोचक, कवि और हास्य-व्यंग्यकार थे। उनका जन्म सन 1894 में खैरागढ़, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ में हुआ था। निबंध लेखन में उनका विशेष योगदान माना जाता है। उनकी रचनाओं में समाज, लोकजीवन, भारतीय कृषि, अध्यात्म और सामाजिक संबंधों का विचारपूर्ण विश्लेषण मिलता है। उनका निधन सन 1971 में हुआ।
पाठ का पूरा सारांश
“क्या लिखूँ?” एक आत्मपरक और व्यंग्यात्मक निबंध है। लेखक को आज निबंध लिखना ही है, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे क्या और कैसे लिखें। लेखक सबसे पहले अंग्रेज़ी निबंधकार ए.जी. गार्डिनर के विचार का उल्लेख करते हैं। गार्डिनर का मानना है कि लेखन एक विशेष मानसिक स्थिति में होता है। जब मन में भावों का आवेग उठता है, तब कोई भी विषय केवल बहाना बन जाता है। असली महत्त्व विषय का नहीं, बल्कि लेखक के मनोभावों का होता है।
लेखक इस विचार से सहमत तो हैं, लेकिन अपनी कठिनाई भी बताते हैं। उनके भीतर भाव अपने-आप नहीं उठते; उन्हें सोचना पड़ता है, चिंतन करना पड़ता है और परिश्रम करना पड़ता है। इस बार उन्हें और अधिक मेहनत करनी है क्योंकि नमिता ने उनसे “दूर के ढोल सुहावने” पर और अमिता ने “समाज-सुधार” पर आदर्श निबंध माँगा है।
लेखक सोचते हैं कि आदर्श निबंध लिखने से पहले निबंध-शास्त्र के आचार्यों की राय जानना चाहिए। कुछ विद्वानों के अनुसार निबंध छोटा होना चाहिए, क्योंकि बहुत लंबे निबंध में रचना की सुंदरता कम हो सकती है। फिर लेखक समझते हैं कि निबंध के दो मुख्य अंग हैं— सामग्री और शैली। सामग्री के लिए अध्ययन, मनन और शोध चाहिए, लेकिन लेखक के पास समय कम है।
इसके बाद लेखक रूपरेखा बनाने की बात करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि निबंध लिखने के बाद उसका सार निकालना आसान हो सकता है, पर लिखने से पहले रूपरेखा बनाना उनके लिए कठिन है। वे बड़े लेखकों के उदाहरण से बताते हैं कि शीर्षक और नामकरण भी लेखन की कठिन प्रक्रिया का हिस्सा हैं।
फिर लेखक शैली पर विचार करते हैं। विद्वान कहते हैं कि भाषा में प्रवाह होना चाहिए और वाक्य छोटे-छोटे होने चाहिए। लेखक व्यंग्यपूर्वक कठिन भाषा और अलंकारों की परंपरा की ओर संकेत करते हैं।
इसके बाद लेखक फ्रांसीसी निबंधकार मोंटेन की पद्धति का उल्लेख करते हैं। मोंटेन की पद्धति में लेखक अपने देखे, सुने और अनुभव किए हुए जीवन को सहज रूप में लिखता है। इसमें लेखक की सच्ची अनुभूति और निजी भाव प्रमुख होते हैं।
फिर लेखक को अमीर खुसरो की कहानी याद आती है। कहानी में चार स्त्रियाँ अलग-अलग विषयों— खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल—पर कविता सुनना चाहती हैं। खुसरो एक ही रचना में चारों विषयों को मिला देते हैं। लेखक इसी तरकीब को अपनाते हैं और दोनों विषयों को एक ही निबंध में जोड़ने का विचार करते हैं।
अब लेखक “दूर के ढोल सुहावने” की व्याख्या करते हैं। ढोल पास से कर्कश लग सकता है, लेकिन दूर से वही आवाज़ मधुर और मनोहर लगती है। इसलिए दूर की वस्तु या स्थिति अक्सर अच्छी लगती है, क्योंकि दूरी से उसकी वास्तविक कठिनाइयाँ दिखाई नहीं देतीं।
इसी आधार पर लेखक तरुणों और वृद्धों की मानसिकता की तुलना करते हैं। युवा भविष्य को सुंदर मानते हैं, जबकि वृद्ध अतीत को सुखद मानते हैं। युवा भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को वर्तमान में देखना चाहते हैं। इसलिए वर्तमान हमेशा असंतोष और सुधार की मांग से भरा रहता है।
अंत में लेखक समाज-सुधार की बात करते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य के इतिहास में ऐसा कोई समय नहीं रहा जब सुधार की आवश्यकता न रही हो। जीवन में नए दोष पैदा होते हैं और नए सुधार भी होते हैं। जो कभी सुधार था, वह आगे चलकर दोष भी बन सकता है। इसी कारण जीवन को प्रगतिशील माना गया है।
पाठ का केंद्रीय भाव
इस निबंध का केंद्रीय भाव यह है कि लेखन केवल विषय पर जानकारी लिख देना नहीं है, बल्कि लेखक के अनुभव, भाव, चिंतन, शैली और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है। लेखक निबंध-लेखन की कठिनाइयों को हास्य, व्यंग्य और आत्मीयता के साथ समझाते हैं। साथ ही वे यह भी बताते हैं कि दूर से कोई वस्तु या स्थिति अच्छी लग सकती है, लेकिन निकट जाकर उसका यथार्थ समझ आता है।
शीर्षक “क्या लिखूँ?” की सार्थकता
यह शीर्षक अत्यंत सार्थक है क्योंकि पूरे निबंध में लेखक इसी दुविधा से जूझते हैं कि वे क्या लिखें और कैसे लिखें। उन्हें दो विषयों पर आदर्श निबंध लिखना है, लेकिन वे लेखन की प्रक्रिया, विषय, सामग्री, रूपरेखा और शैली की समस्या में उलझ जाते हैं। इसलिए “क्या लिखूँ?” शीर्षक लेखक की मानसिक स्थिति और पूरे निबंध की मूल समस्या को प्रकट करता है।
पाठ की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| आत्मपरक शैली | लेखक स्वयं पाठक से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है। |
| हास्य-व्यंग्य | लेखक अपनी कठिनाई को रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है। |
| विचारात्मकता | पाठ में लेखन, समाज-सुधार, पीढ़ीगत दृष्टि और जीवन की प्रगति पर विचार है। |
| उदाहरणों का प्रयोग | गार्डिनर, मोंटेन, शेक्सपीयर, अमीर खुसरो आदि के संदर्भ दिए गए हैं। |
| लोकोक्ति का विस्तार | “दूर के ढोल सुहावने” को गहराई से समझाया गया है। |
| निबंध-लेखन की प्रक्रिया | सामग्री, शैली, रूपरेखा, अनुभव और भावों की भूमिका बताई गई है। |
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
लेखक को निबंध लिखने में कठिनाई इसलिए हो रही थी क्योंकि उन्हें दो अलग-अलग विषयों पर आदर्श निबंध लिखने थे। नमिता “दूर के ढोल सुहावने” पर निबंध चाहती थी और अमिता “समाज-सुधार” पर। लेखक को विषय, सामग्री, रूपरेखा और शैली सभी पर विचार करना पड़ रहा था।
गार्डिनर के अनुसार लेखन तब होता है जब मन में विशेष भाव-स्थिति पैदा होती है। उस समय लेखक के भीतर उमंग, स्फूर्ति और आवेग उठता है। तब कोई भी विषय केवल भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन जाता है।
लेखक मानते हैं कि गार्डिनर का विचार सही है, लेकिन वे स्वयं ऐसी सहज मानसिक स्थिति का अनुभव नहीं करते। उन्हें लिखने के लिए सोच-विचार, चिंतन और परिश्रम करना पड़ता है।
निबंध के दो मुख्य अंग हैं— सामग्री और शैली। सामग्री में विषय से जुड़े विचार, तथ्य और अनुभव आते हैं, जबकि शैली अभिव्यक्ति का ढंग है।
मोंटेन की पद्धति में लेखक अपने देखे, सुने और अनुभव किए हुए जीवन को स्वतंत्र और सहज रूप में लिखता है। इसमें लेखक की सच्ची अनुभूति और निजी भाव प्रमुख होते हैं।
अमीर खुसरो की कहानी से लेखक को एक उपाय मिलता है। जिस प्रकार खुसरो ने चार विषयों को एक ही पद्य में मिला दिया था, उसी तरह लेखक भी दो विषयों— “दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार”—को एक ही निबंध में जोड़ने का विचार करते हैं।
इस लोकोक्ति का अर्थ है कि दूर से कोई वस्तु, व्यक्ति या स्थिति आकर्षक लग सकती है, लेकिन उसके पास जाने पर उसकी वास्तविक कठिनाइयाँ समझ में आती हैं।
युवा भविष्य को सुंदर मानते हैं और उसे वर्तमान में लाना चाहते हैं। वृद्ध अतीत को सुखद मानते हैं और उसे वर्तमान में फिर से देखना चाहते हैं। इसी कारण दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
लेखक के अनुसार समाज-सुधार की आवश्यकता हर युग में रही है। जीवन में नए दोष पैदा होते हैं और उनके लिए नए सुधार आवश्यक हो जाते हैं। इसलिए सुधार की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती।
पाठ से सीख मिलती है कि अच्छा लेखन केवल जानकारी का संग्रह नहीं है। उसमें अनुभव, विचार, भावना, शैली, रूपरेखा और लेखक की निजी दृष्टि का संतुलन होना चाहिए।
NCERT “मेरे उत्तर मेरे तर्क” — उत्तर संकेत
NCERT अभ्यास में दिए गए MCQ भाग में निबंध के भाव, मोंटेन की पद्धति, युवा-वृद्ध तुलना, अमीर खुसरो की कथा और समाज-सुधार से जुड़े प्रश्न दिए गए हैं।
| प्रश्न | सही उत्तर | कारण |
|---|---|---|
| 1 | क | “हैट” लेखक के भावों और “खूँटी” विषय का प्रतीक है; भाव विषय से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। |
| 2 | घ | मोंटेन की पद्धति अनुभव-आधारित स्वच्छंद लेखन को महत्त्व देती है। |
| 3 | घ | तरुणों का आधार अभिलाषा है और वृद्धों का आधार अनुभव। |
| 4 | ख | अमीर खुसरो की कथा कई विषयों को एक साथ जोड़ने की प्रतिभा दिखाती है। |
| 5 | क | लेखक के अनुसार सुधार की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है। |
मेरी समझ मेरे विचार — प्रश्नोत्तर
ए.जी. गार्डिनर के अनुसार लेखन तब होता है जब लेखक के मन में भावों का आवेग उठता है। उस समय कोई भी विषय केवल भावों को व्यक्त करने का माध्यम बन जाता है। लेकिन लेखक के अनुसार उनके मन में भाव अपने-आप नहीं आते। उन्हें लिखने से पहले सोचना, चिंतन करना और परिश्रम करना पड़ता है। इसलिए गार्डिनर लेखन को सहज मानते हैं, जबकि लेखक उसे मेहनत और तैयारी से जुड़ा कार्य मानते हैं।
तरुण भविष्य को सुंदर मानते हैं। उन्हें लगता है कि आने वाला समय अधिक अच्छा होगा, इसलिए वे वर्तमान से संतुष्ट नहीं रहते। वृद्ध लोग अपने अतीत को सुखद मानते हैं। वे पुराने समय को याद करते हैं और उसे वर्तमान से अच्छा समझते हैं। इसलिए वे भी वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं। इस प्रकार तरुण भविष्य के कारण और वृद्ध अतीत के कारण वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
नमिता लेखक से “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” विषय पर निबंध लिखवाना चाहती है। अमिता “समाज-सुधार” विषय पर निबंध चाहती है। लेखक को कठिनाई इसलिए हुई क्योंकि दोनों विषय अलग-अलग और गंभीर थे। उन्हें आदर्श निबंध लिखना था, पर उनके पास समय कम था और सामग्री जुटाने के लिए कोई पुस्तकालय या संदर्भ-ग्रंथ भी नहीं था।
आदर्श निबंध लिखने के लिए विषय की अच्छी जानकारी, सही सामग्री, सुंदर शैली और रूपरेखा आवश्यक है। भाषा सरल और स्पष्ट होनी चाहिए। वाक्य छोटे और प्रभावशाली होने चाहिए। मैं निबंध लिखने से पहले विषय को समझता हूँ, फिर मुख्य बिंदु लिखता हूँ। उसके बाद भूमिका, मुख्य भाग और निष्कर्ष की रूपरेखा बनाकर निबंध लिखता हूँ।
निबंध लेखन में देखने, सुनने और अनुभव करने का बहुत महत्व है। इससे लेखक को विषय की सही जानकारी और गहराई मिलती है। जब लेखक अपने अनुभव के आधार पर लिखता है, तो उसका निबंध अधिक सच्चा, रोचक और प्रभावशाली बनता है। इसलिए अच्छे निबंध के लिए केवल पुस्तकीय ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभव भी जरूरी है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
“क्या लिखूँ?” निबंध में लेखक ने निबंध-लेखन की प्रक्रिया को बहुत स्वाभाविक और रोचक ढंग से स्पष्ट किया है। लेखक सबसे पहले लेखन की मानसिक स्थिति पर विचार करते हैं। वे गार्डिनर के विचार से बताते हैं कि लेखन के लिए मन में भावों का आवेग आवश्यक है। इसके बाद वे निबंध के दो मुख्य अंगों— सामग्री और शैली—की चर्चा करते हैं। सामग्री के लिए अध्ययन, मनन और विचार-संग्रह जरूरी है। शैली के लिए भाषा में प्रवाह और वाक्यों में स्पष्टता आवश्यक है। लेखक रूपरेखा के महत्व को भी स्वीकार करते हैं। अंत में वे अनुभव-आधारित लेखन को महत्त्व देते हैं।
लेखक ने इस लोकोक्ति को ढोल के उदाहरण से समझाया है। ढोल पास से कर्कश और तेज़ लगता है, लेकिन दूर से वही ध्वनि मधुर प्रतीत होती है। इसी प्रकार जीवन में भी दूर की वस्तु, स्थिति या समय हमें अधिक सुंदर लगता है, क्योंकि हम उसकी वास्तविक कठिनाइयों से दूर होते हैं।
लेखक के अनुसार युवा भविष्य को उज्ज्वल मानते हैं और परिवर्तन के समर्थक होते हैं। वे भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं। दूसरी ओर वृद्ध अतीत को गौरवपूर्ण और सुखद मानते हैं। वे अतीत को वर्तमान में फिर से देखना चाहते हैं। इस कारण वर्तमान दोनों के बीच संघर्ष का क्षेत्र बन जाता है।
लेखक समाज-सुधार को जीवन की निरंतर प्रक्रिया मानते हैं। उनके अनुसार मानव इतिहास में कभी ऐसा समय नहीं रहा जब सुधार की आवश्यकता न पड़ी हो। समाज में नए दोष पैदा होते रहते हैं और उन्हें दूर करने के लिए नए सुधार जरूरी होते हैं। इसलिए सुधार का क्रम कभी समाप्त नहीं होता। यही जीवन को प्रगतिशील बनाता है।
Competency-Based (बोधात्मक) Questions with Answers
हाँ, मैं इस विचार से सहमत हूँ। केवल विषय चुन लेने से अच्छा लेखन नहीं हो जाता। यदि लेखक के भीतर अनुभव, संवेदना और विचार नहीं हैं, तो लेखन प्रभावशाली नहीं होगा। इसलिए लेखन में विषय माध्यम है, पर लेखक की दृष्टि और भाव असली शक्ति हैं।
हाँ, संभव है कि उनका निबंध अधिक तथ्यपूर्ण और व्यवस्थित होता। इंटरनेट और पुस्तकालय से उन्हें अधिक सामग्री मिल जाती। परंतु केवल सामग्री से निबंध उत्कृष्ट नहीं होता। लेखक की मौलिक दृष्टि, अनुभव और शैली फिर भी आवश्यक रहती।
पाठ में ढोल का उदाहरण दिया गया है। ढोल पास से कर्कश लगता है, पर दूर से उसकी ध्वनि मधुर प्रतीत होती है। इसी तरह किसी वस्तु या स्थिति को दूर से देखकर हम उसके बारे में अच्छा अनुमान लगा लेते हैं, लेकिन निकट से उसकी वास्तविकता सामने आती है।
लेखक ने समाज-सुधार को स्थायी आवश्यकता इसलिए माना है क्योंकि समाज लगातार बदलता रहता है। परिवर्तन के साथ नई समस्याएँ और नए दोष उत्पन्न होते हैं। इसलिए हर युग में नए सुधारों की जरूरत पड़ती है।
मोंटेन की पद्धति छात्रों को अनुभव-आधारित लेखन सिखाती है। छात्र केवल रटकर लिखने के बजाय अपने देखे, सुने और महसूस किए अनुभवों को लिख सकते हैं। इससे लेखन मौलिक, जीवंत और प्रभावशाली बनता है।
पाठ से जुड़े मूल्य
| मूल्य | पाठ से संबंध |
|---|---|
| मौलिकता | लेखक अनुभव-आधारित लेखन को महत्त्व देता है। |
| आत्मचिंतन | लेखक स्वयं से प्रश्न करता है कि क्या और कैसे लिखा जाए। |
| व्यावहारिकता | निबंध लेखन में सामग्री, रूपरेखा और शैली की जरूरत बताई गई है। |
| सामाजिक चेतना | समाज-सुधार की आवश्यकता पर विचार किया गया है। |
| परिवर्तनशीलता | जीवन को प्रगतिशील माना गया है। |
| अनुभव का महत्व | दूर की कल्पना और निकट के अनुभव का अंतर समझाया गया है। |
व्याकरण की बात: समास
समास दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से बने संक्षिप्त और नए अर्थ वाले शब्द को कहते हैं।
उदाहरण
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास का प्रकार |
|---|---|---|
| निबंध-रचना | निबंध की रचना | तत्पुरुष |
| निबंधशास्त्र | निबंध का शास्त्र | तत्पुरुष |
| समाज-सुधार | समाज का सुधार | तत्पुरुष |
| जीवन-संग्राम | जीवन का संग्राम | तत्पुरुष |
| अतीत-गौरव | अतीत का गौरव | तत्पुरुष |
| नव-वधू | नई वधू | कर्मधारय |
| लज्जाशील | लज्जा से युक्त | बहुव्रीहि/गुणसूचक संदर्भ |
| भाई-बहन | भाई और बहन | द्वंद्व |
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार | अव्ययीभाव |
उपसर्ग और प्रत्यय
उपसर्ग
जो शब्दांश मूल शब्द के पहले लगकर नया शब्द बनाते हैं, वे उपसर्ग कहलाते हैं।
| शब्द | मूल शब्द | उपसर्ग | अर्थ |
|---|---|---|---|
| दुर्बोध | बोध | दुर् | कठिन समझ में आने वाला |
| अनादि | आदि | अन् | जिसका आदि न हो |
| असंतोष | संतोष | अ | संतोष का अभाव |
| अस्पष्टता | स्पष्ट | अ | स्पष्ट न होना |
| अनुसरण | सरण/चलना | अनु | पीछे चलना/पालन करना |
प्रत्यय
जो शब्दांश मूल शब्द के अंत में लगकर नया शब्द बनाते हैं, वे प्रत्यय कहलाते हैं।
| शब्द | मूल शब्द | प्रत्यय | अर्थ |
|---|---|---|---|
| सुधारक | सुधार | क | सुधार करने वाला |
| कठिनाई | कठिन | आई | कठिन होने की अवस्था |
| मधुरता | मधुर | ता | मधुर होने का भाव |
| सुंदरता | सुंदर | ता | सुंदर होने का भाव |
| सामाजिक | समाज | इक | समाज से संबंधित |
भाव-विस्तार
वाक्य 1: “जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।”
युवा अवस्था में व्यक्ति जीवन की वास्तविक कठिनाइयों से पूरी तरह परिचित नहीं होता। इसलिए उसे भविष्य सुंदर, आकर्षक और संभावनाओं से भरा दिखाई देता है। अनुभव की कमी के कारण वह संसार को कल्पना के आधार पर देखता है, वास्तविक संघर्ष के आधार पर नहीं।
वाक्य 2: “मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।”
समाज हमेशा परिवर्तनशील रहता है। हर समय में कुछ न कुछ दोष, अन्याय या अव्यवस्था पैदा होती है। इन्हें दूर करने के लिए सुधार आवश्यक होते हैं। इसलिए समाज-सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
वाक्य 3: “आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।”
आज का युवा भविष्य को श्रेष्ठ मानता है, लेकिन जब वह वृद्ध होगा तो अपने ही बीते समय को सुंदर मानने लगेगा। इसका अर्थ है कि समय बदलने के साथ व्यक्ति की दृष्टि भी बदल जाती है।
लेखन अभ्यास: “दूर के ढोल सुहावने” पर छोटा निबंध
दूर से दिखाई देने वाली वस्तु अक्सर हमें सुंदर और आकर्षक लगती है, क्योंकि हम उसके वास्तविक पक्ष को नहीं जानते। यही बात “दूर के ढोल सुहावने” लोकोक्ति में कही गई है। ढोल पास से बहुत तेज़ और कर्कश लग सकता है, लेकिन दूर से वही ध्वनि मधुर प्रतीत होती है। इसी प्रकार कई बार हमें दूसरों का जीवन, नौकरी, पद या सुविधा बहुत अच्छी लगती है, पर उसके पीछे की मेहनत, कठिनाई और संघर्ष हमें दिखाई नहीं देते। इसलिए किसी भी वस्तु या स्थिति का सही मूल्यांकन निकट अनुभव के आधार पर करना चाहिए, केवल दूर से देखकर नहीं।
लेखन अभ्यास: “समाज-सुधार” पर छोटा निबंध
समाज-सुधार का अर्थ है समाज में फैली बुराइयों, अन्याय और असमानताओं को दूर करना। समाज हमेशा बदलता रहता है, इसलिए सुधार की आवश्यकता भी हमेशा बनी रहती है। प्राचीन समय से लेकर आज तक अनेक सुधारकों ने समाज को नई दिशा दी है। आज भी शिक्षा, पर्यावरण, लैंगिक समानता, दिव्यांगजन अधिकार, स्वच्छता और डिजिटल जागरूकता जैसे क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है। समाज-सुधार केवल बड़े नेताओं का काम नहीं है; हर नागरिक अपने व्यवहार, सोच और जिम्मेदारी से समाज को बेहतर बना सकता है।
अतिरिक्त MCQ Practice
उत्तर: ग. निबंध
उत्तर: क. नमिता और अमिता के लिए
उत्तर: ख. सामग्री और शैली
उत्तर: ख. दूर की चीज़ वास्तविकता से अलग आकर्षक लगती है
उत्तर: ख. प्रगतिशील
Comments
Join the discussion