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Do Bailon Ki Katha | दो बैलों की कथा - मुंशी प्रेमचंद | पूरा पाठ, शब्दार्थ और व्याख्या
BEBO Yadav Last updated 03 May 2026 Notes 0 comments
दो बैलों की कथा Class 9 | सारांश, शब्दार्थ, व्याख्या (Munshi Premchand)
दो बैलों की कथा
मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी — हीरा और मोती के प्रेम, स्वामीभक्ति, स्वतंत्रता-संघर्ष और आत्मसम्मान की पूरी व्याख्या
लेखक: मुंशी प्रेमचंद | कक्षा -9 हिंदी (गंगा) — पूरा पाठ, शब्दार्थ और व्याख्या
क्या आप 'दो बैलों की कथा' पाठ का सारांश, शब्दार्थ और प्रश्नोत्तर ढूंढ रहे हैं? अगर हाँ, तो आपकी तलाश यहाँ पूरी होती है। इस लेख में आपको पाठ का सरल सारांश, कठिन शब्दों के अर्थ, गद्य खंडों की व्याख्या, महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर, समानार्थी शब्द और मुहावरे एक ही जगह मिलेंगे।
Quick Summary: ‘दो बैलों की कथा’ मुंशी प्रेमचंद की एक संवेदनशील कहानी है, जिसमें हीरा और मोती नाम के दो बैलों के माध्यम से प्रेम, मित्रता, स्वामीभक्ति और स्वतंत्रता की भावना को प्रस्तुत किया गया है। दोनों बैल झूरी से गहरा लगाव रखते हैं और एक-दूसरे के सच्चे साथी हैं। गया के घर अत्याचार सहने, भूख-प्यास झेलने और कांजीहौस में बंद होने के बाद भी वे हिम्मत नहीं हारते। वे हर कठिन परिस्थिति में एक-दूसरे का साथ निभाते हैं और अंततः अपने घर लौट आते हैं। यह कहानी बताती है कि स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और सच्ची मित्रता जीवन के सबसे बड़े मूल्य हैं।
मुंशी प्रेमचंद का जन्म सन 1880 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय था। उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी की, परंतु
असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरी तरह लेखन के प्रति समर्पित हो गए। उनकी कहानियाँ 'मानसरोवर' के आठ भागों में संकलित हैं। गोदान, गबन, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि आदि उनके प्रमुख उपन्यास हैं। वे किसान, मज़दूर, दलित और स्त्रियों से जुड़े विषयों पर लिखते थे। सन 1936 में उनका निधन हो गया।
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📘 पाठ में प्रवेश
‘दो बैलों की कथा’ में लेखक ने पशुओं के माध्यम से प्रेम, मित्रता, स्वामीभक्ति, स्वतंत्रता और अन्याय के विरोध की भावना को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। हीरा और मोती केवल बैल नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सच्ची मित्रता के प्रतीक बनकर सामने आते हैं।
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📚 पाठ का सारांश (Path ka Saransh)
‘दो बैलों की कथा’ में झूरी नामक किसान के दो बैल—हीरा और मोती—मुख्य पात्र हैं। दोनों बैल परिश्रमी, समझदार और एक-दूसरे के प्रति अत्यंत स्नेह रखने वाले हैं। वे बिना बोले ही एक-दूसरे के मन की बात समझ लेते हैं और काम, भोजन तथा विश्राम—हर स्थिति में साथ रहना चाहते हैं। एक दिन झूरी उन्हें अपने साले गया के पास भेज देता है। बैलों को लगता है कि उनके मालिक ने उन्हें बेच दिया है। गया के घर उन्हें अपनापन नहीं मिलता, इसलिए वे रात में रस्सियाँ तोड़कर वापस झूरी के पास लौट आते हैं।
कुछ समय बाद गया उन्हें फिर अपने साथ ले जाता है। इस बार वह दोनों को कठोरता से बाँधता है, मारता-पीटता है और अच्छा चारा देने के बजाय सूखा भूसा देता है। वहाँ भैरो की छोटी अनाथ बेटी बैलों की पीड़ा समझती है और रात में उन्हें रोटियाँ खिलाती है। वही बालिका एक दिन उनकी रस्सियाँ खोल देती है, जिससे दोनों भाग निकलते हैं। रास्ते में उनका सामना एक शक्तिशाली साँड़ से होता है, जिसे वे बुद्धि और एकता से हरा देते हैं। बाद में मटर के खेत में चरते समय वे पकड़े जाते हैं और कांजीहौस में बंद कर दिए जाते हैं।
कांजीहौस में उन्हें भोजन नहीं मिलता। वहाँ अनेक पशु भूख से कमजोर पड़े होते हैं। हीरा और मोती अन्य पशुओं को बचाने के लिए दीवार तोड़ने का प्रयास करते हैं। कई पशु भाग निकलते हैं, लेकिन हीरा बँधा रह जाता है और मोती उसे छोड़कर नहीं जाता। बाद में दोनों को नीलामी में एक कसाई खरीद लेता है। रास्ते में वे अपना गाँव और घर पहचान लेते हैं। घर के निकट आते ही उनमें नई शक्ति आ जाती है और वे दौड़कर झूरी के पास पहुँच जाते हैं। मोती कसाई को खदेड़ देता है। अंत में झूरी और उसकी पत्नी दोनों बैलों को प्रेम से स्वीकार करते हैं। कहानी का मुख्य संदेश है कि सच्ची मित्रता, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता।
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गद्य खंड, शब्दार्थ एवं व्याख्या
1 गद्य खंड 1
जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को परले दरजे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याई हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है; किंतु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हो; पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक स्थायी विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुख, हानि-लाभ, किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं; पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है।
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📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
बुद्धिहीन
मूर्ख, बिना बुद्धि का
परले दरजे
सबसे बुरा, अंतिम स्तर का
पदवी
उपाधि, नाम
ब्याई हुई
ब्याने वाली गाय, बच्चा देने वाली
सिंहनी
स्त्री सिंह
निरापद
बिना डर का, सुरक्षित
सहिष्णुता
सहन करने की क्षमता
असंतोष
नाराज़गी, असंतुष्टि
कुलेल
उछल-कूद, शरारत
विषाद
उदासी, दुःख
पराकाष्ठा
चरम सीमा, सबसे ऊँचा स्तर
इस अंश में लेखक गधे के स्वभाव के बहाने समाज की सोच पर व्यंग्य करते हैं। सामान्य लोग गधे को मूर्ख समझते हैं, पर लेखक उसके सीधेपन और सहनशीलता को एक बड़ा गुण मानते हैं। गधा बिना विरोध किए हर कष्ट सहता है और कभी क्रोध नहीं दिखाता। लेखक बताना चाहते हैं कि दुनिया में अत्यधिक शांत और सहनशील व्यक्ति को अक्सर कमजोर या मूर्ख समझ लिया जाता है। यह अंश सरलता और सहनशीलता के गलत मूल्यांकन को सामने रखता है।
2 गद्य खंड 2
सद्गुणों का इतना अनादर कहीं नहीं देखा। कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है? क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया।
लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है 'बैल'। जिस अर्थ में हम 'गधा' शब्द का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में 'बछिया के ताऊ' का भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफों में सर्वश्रेष्ठ कहेंगे; मगर हमारा विचार ऐसा नहीं है। बैल कभी-कभी मारता भी है, कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपना असंतोष प्रकट कर देता है; अतएव उसका स्थान गधे से नीचा है।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
अनादर
अपमान, बेइज्जती
कदाचित
शायद, हो सकता है
दुर्दशा
बुरा हाल, दयनीय स्थिति
कुसमय
बुरे समय के लिए
बदनाम
अपमानित, निंदित
गण्य
गिना जाने योग्य, महत्वपूर्ण
अड़ियल
जिद्दी, हठी
अतएव
इसलिए
मिसाल
उदाहरण, नमूना
इस भाग में लेखक सीधे और मेहनती लोगों की उपेक्षा पर चिंता व्यक्त करते हैं। वे बताते हैं कि संसार में कई बार शांत और सज्जन लोगों को सम्मान नहीं मिलता, जबकि ताकत दिखाने वालों को महत्व दिया जाता है। भारतीयों की स्थिति और जापान का उदाहरण देकर लेखक समाज की मानसिकता पर प्रश्न उठाते हैं। इसके बाद वे बैल को गधे से थोड़ा अलग बताते हैं, क्योंकि बैल अन्याय होने पर कभी-कभी विरोध भी करता है। यह अंश आत्मसम्मान और प्रतिरोध की आवश्यकता को संकेत करता है।
3 गद्य खंड 3
झूरी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाईं जाति के थे- देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक, दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूंघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे - विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिए जाते और गरदन हिला हिलाकर चलते, उस वक्त हरएक की यही चेष्टा होती थी कि ज्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गरदन पर रहे। दिन-भर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते, तो एक-दूसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा लिया करते। नाँद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नाँद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता था।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
पछाईं
बैल की एक जाति/नस्ल
चौकस
चुस्त, सतर्क
डील
बदन, शरीर की बनावट
मूक-भाषा
बिना बोले संवाद की भाषा
विचार-विनिमय
विचारों का आदान-प्रदान
गुप्त शक्ति
छिपी हुई शक्ति
वंचित
महरूम, जिसे कुछ न मिला हो
विनोद
मज़ाक, हँसी
आत्मीयता
घनिष्ठता, प्रेम
धौल-धप्पा
मज़ाक में मारपीट
चेष्टा
कोशिश, प्रयास
गराँव
गले में पहना जाने वाला आभूषण
इस अंश में झूरी के दोनों बैलों हीरा और मोती का सुंदर परिचय दिया गया है। दोनों बैल केवल काम करने वाले पशु नहीं, बल्कि प्रेम, समझ और मित्रता के प्रतीक हैं। वे बिना बोले एक-दूसरे के भाव समझ लेते हैं और हर काम में साथ निभाते हैं। उनके बीच का संबंध इतना गहरा है कि वे सुख-दुख, काम और भोजन सबमें एक-दूसरे का साथ चाहते हैं। लेखक ने यहाँ पशुओं के माध्यम से सच्ची मित्रता का मार्मिक चित्र खींचा है।
4 गद्य खंड 4
संयोग की बात, झूरी ने एक बार गोईं को ससुराल भेज दिया। बैलों को क्या मालूम, वे क्यों भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमें बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने, पर झूरी के साले गया को घर तक गोईं ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते; पगहिया पकड़कर आगे से खींचता, तो दोनों पीछे को जोर लगाते। मारता तो दोनों सींग नीचे करके हुँकारते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झूरी से पूछते - तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था तो और काम ले लेते। हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछ खिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथ क्यों बेच दिया?
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
संयोग
घटना, coincidence
गोईं
बैल (बहुवचन)
पगहिया
नाक में लगा हुआ रस्सी का फंदा
हुँकारना
गुस्से से आवाज़ निकालना
वाणी
बोलने की क्षमता
कसर
कमी, त्रुटि
कबूल
मंज़ूर, स्वीकार
जालिम
क्रूर, अत्याचारी
इस अंश में झूरी द्वारा बैलों को ससुराल भेजे जाने की घटना आती है। हीरा और मोती यह समझ लेते हैं कि उन्हें बेच दिया गया है, इसलिए वे गया के साथ जाने से विरोध करते हैं। गया उन्हें ले जाने में बहुत परेशान होता है, क्योंकि बैल मन से उसके साथ नहीं जाना चाहते। लेखक कल्पना करते हैं कि यदि बैलों में बोलने की शक्ति होती, तो वे अपने मालिक से अपनी पीड़ा अवश्य कहते। यह भाग पशुओं की स्वामीभक्ति और उनके भावनात्मक लगाव को स्पष्ट करता है।
5 गद्य खंड 5
संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे। दिन-भर के भूखे थे, लेकिन जब नाँद में लगाए गए, तो एक ने भी उसमें मुँह न डाला। दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था। यह नया घर, नया गाँव, नए आदमी, सब उन्हें बेगानों से लगते थे।
दोनों ने अपनी मूक-भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गए। जब गाँव में सोता पड़ गया, तो दोनों ने जोर मारकर पगहे तुड़ा डाले और घर की तरफ चले। पगहे बहुत मजबूत थे। अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड़ सकेगा; पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी। एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गईं। झूरी प्रातःकाल सोकर उठा, तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं। दोनों की गरदनों में आधा-आधा गराँव लटक रहा है। घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं और दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है। झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। प्रेमालिंगन और चुंबन का वह दृश्य बड़ा ही मनोहर था।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
नाँद
जानवरों के खाने की थाली
बेगाना
अजनबी, पराया
कनखियों
आँखों के कोनों से
पगहे
पैरों में बंधी रस्सियाँ
दूनी
दोगुनी
प्रातःकाल
सुबह का समय
चरनी
चारा खिलाने की जगह
विद्रोहमय
बगावत भरा हुआ
गद्गद
भावुक, प्रसन्न
प्रेमालिंगन
प्यार से गले लगाना
यहाँ दोनों बैलों की अपने घर के प्रति गहरी ममता दिखाई देती है। नए स्थान पर पहुँचकर वे भोजन तक नहीं करते, क्योंकि उनका मन झूरी के घर में ही अटका रहता है। रात में वे अपनी पूरी शक्ति लगाकर रस्सियाँ तोड़ते हैं और वापस अपने घर लौट आते हैं। सुबह जब झूरी उन्हें देखता है, तो उसका प्रेम उमड़ पड़ता है। इस अंश में घर, अपनापन और स्वामी के प्रति प्रेम का अत्यंत भावुक चित्रण है।
6 गद्य खंड 6
घर और गाँव के लड़के जमा हो गए और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे। गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण थी। बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशु-वीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए। कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड़, कोई चोकर, कोई भूसी। एक बालक ने कहा- "ऐसे बैल किसी के पास न होंगे।" दूसरे ने समर्थन किया- "इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए।' तीसरा बोला - "बैल नहीं हैं वे, उस जनम के आदमी हैं।"
इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस न हुआ। झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी। बोली- "कैसे नमक-हराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया; भाग खड़े हुए।" झूरी अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका- "नमकहराम क्यों हैं? चारा-दाना कुछ न दिया होगा, तो क्या करते?" स्त्री ने रोब के साथ कहा- "बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं।" झूरी ने चिढ़ाया- "चारा मिलता तो क्यों भागते?" स्त्री चिढ़ी - "भागे इसलिए कि वे लोग तुम-जैसे बुद्धुओं की तरह बैलों को सहलाते नहीं। खिलाते हैं, तो रगड़कर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले। अब देखूँ, कहाँ से खली और चोकर मिलता है! सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूँगी, खाएँ चाहें मरें।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
अभूतपूर्व
जैसा पहले कभी न हुआ हो
अभिनंदन-पत्र
स्वागत समारोह का पत्र
चोकर
आटा छानने के बाद बचा छिलका
प्रतिवाद
विरोध, अपना पक्ष रखना
आक्षेप
दोष लगाना, आरोप
नमक-हराम
वफादारी न करने वाला
रोब
गुस्सा, दबदबा
बुद्धु
मूर्ख, सीधा-सादा
कामचोर
काम से भागने वाला
इस भाग में बैलों की वापसी पर गाँव के बच्चों का उत्साह दिखाया गया है। बच्चे उन्हें साधारण पशु नहीं, बल्कि वीर समझकर उनका स्वागत करते हैं। दूसरी ओर झूरी की पत्नी उन्हें कामचोर और नमक-हराम कहकर डाँटती है। झूरी अपने बैलों की वफादारी समझता है और उनके पक्ष में खड़ा होता है। यहाँ लेखक ने प्रेम और कठोर दृष्टिकोण के अंतर को दिखाया है।
7 गद्य खंड 7
वही हुआ। मजूर को बड़ी ताकीद कर दी गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए। बैलों ने नाँद में मुँह डाला, तो फीका-फीका। न कोई चिकनाहट, न कोई रस। क्या खाएँ? आशा-भरी आँखों से द्वार की ओर ताकने लगे। झूरी ने मजूर से कहा- "थोड़ी-सी खली क्यों नहीं डाल देता?" "मालकिन मुझे मार ही डालेंगी।" "चुराकर डाल आ।" "ना दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे।" दूसरे दिन झूरी का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाड़ी में जोता।
दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा; पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था। संध्या-समय घर पहुँचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बाँधा और कल की शरारत का मजा चखाया। फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बैलों को खली, चूनी सब कुछ दी। दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। झूरी इन्हें फूल की छड़ी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। यहाँ मार पड़ी। आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा। नाँद की तरफ आँखें तक न उठाईं।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
ताकीद
चेतावनी, सख्त हिदायत
चिकनाहट
चिकनापन, रसीलापन
खली
तिलहन पीसने के बाद बचा छिलका
चूनी
चूने जैसा पदार्थ (खाद्य)
टिटकार
मुँह से बुलाने की आवाज़
व्यथा
पीड़ा, दुःख
अपमान
बेइज्जती
इस अंश में बैलों के प्रति घर की मालकिन की कठोरता और गया के दुर्व्यवहार की भूमिका बनती है। बैलों को केवल सूखा भूसा दिया जाता है, जिसे वे मन मारकर देखते हैं। झूरी उन्हें अच्छा चारा देना चाहता है, पर मजदूर मालकिन के डर से ऐसा नहीं कर पाता। बाद में गया उन्हें फिर ले जाता है और रास्ते में मोती विरोध करने की कोशिश करता है। इस भाग में बैलों के अपमान, पीड़ा और भीतर उठते असंतोष को दिखाया गया है।
8 गद्य खंड 8
दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया; पर दोनों ने पाँव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाए, तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया। हल लेकर भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाट कर बराबर हो गया। गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं, तो दोनों पकड़ाई में न आते। हीरा ने मूक-भाषा में कहा- "भागना व्यर्थ है।" मोती ने उत्तर दिया- "तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।" "अबकी बड़ी मार पड़ेगी।" "पड़ने दो, बैल का जन्म लिया है, तो मार से कहाँ तक बचेंगे?" गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा है। दोनों के हाथों में लाठियाँ हैं। मोती बोला- "कहो तो दिखा दूँ कुछ मजा मैं भी। लाठी लेकर आ रहा है।" हीरा ने समझाया- "नहीं भाई! खड़े हो जाओ।" "मुझे मारेगा, तो मैं भी एक-दो को गिरा दूँगा!" "नहीं। हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
निर्दयी
बेरहम, क्रूर
जुआ
हल की लकड़ी का हिस्सा
टूट-टाट
टुकड़े-टुकड़े
तेवर
अंदाज़, रंग-ढंग
मसलहत
समझदारी, सही वक्त देखना
धर्म
कर्तव्य, नियम
यहाँ गया की क्रूरता के कारण बैलों का धैर्य टूटता दिखाई देता है। गया उन्हें हल में जोतता है, लेकिन वे काम करने से मना कर देते हैं। हीरा पर अत्याचार देखकर मोती का क्रोध भड़क उठता है और वह हल लेकर भागता है। फिर भी हीरा उसे संयम और धर्म का पाठ पढ़ाता है। यह अंश बताता है कि अन्याय के विरुद्ध क्रोध स्वाभाविक है, लेकिन विवेक और मर्यादा भी आवश्यक हैं।
9 गद्य खंड 9
मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुँचा और दोनों को पकड़ कर ले चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती भी पलट पड़ता। उसके तेवर देखकर गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही मसलहत है।
आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया। दोनों चुपचाप खड़े रहे। घर के लोग भोजन करने लगे। उस वक्त एक छोटी-सी लड़की दो रोटियाँ लिए निकली और दोनों के मुँह में देकर चली गई। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहाँ भी किसी सज्जन का वास है। लड़की भैरो की थी। उसकी माँ मर चुकी थी। सौतेली माँ उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी। दोनों दिन-भर जोते जाते, डंडे खाते, अड़ते। शाम को थान पर बाँध दिए जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ खिला जाती। प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
ऐंठकर
दबाकर, रोककर
सहायक
मददगार
हृदय
दिल
सज्जन
अच्छा इंसान
वास
रहना, निवास
अनाथ
माता-पिता रहित
प्रसाद
प्रेम का भोजन, वरदान
बरकत
फायदा, कृपा
विद्रोह
बगावत, विरोध
इस अंश में बैलों के जीवन में करुणा की एक छोटी किरण दिखाई देती है। गया के घर में उन्हें सूखा भूसा और कठोर व्यवहार मिलता है, लेकिन भैरो की छोटी अनाथ बेटी उन्हें रोटियाँ खिलाती है। स्वयं दुख झेलने वाली वह बच्ची बैलों की पीड़ा समझती है। उसकी दो रोटियाँ बैलों के शरीर से अधिक उनके मन को सहारा देती हैं। लेखक ने यहाँ दया, सहानुभूति और आत्मीयता की शक्ति को दर्शाया है।
10 गद्य खंड 10
एक दिन मोती ने मूक-भाषा में कहा- "अब तो नहीं सहा जाता, हीरा!" "क्या करना चाहते हो?" "एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूँगा।" "लेकिन जानते हो, वह प्यारी लड़की, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लड़की है, जो इस घर का मालिक है। यह बेचारी अनाथ न हो जाएगी?" "तो मालकिन को न फेंक दूँ। वही तो उस लड़की को मारती है।" "लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो।" "तुम तो किसी तरह से निकलने ही नहीं देते। बताओ, तुड़ाकर भाग चलें।" "हाँ, यह मैं स्वीकार करता हूँ, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे?" "इसका एक उपाय है। पहले रस्सी को थोड़ा-सा चबा लो। फिर एक झटके में टूट जाती है।" रात को जब बालिका रोटियाँ खिलाकर चली गई, तो दोनों रस्सियाँ चबाने लगे, पर मोटी रस्सी मुँह में न आती थी। बेचारे बार-बार जोर लगाकर रह जाते थे।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
एकाध
एक-दो
अनाथ
बेसहारा, माँ-बाप के बिना
जात
प्राणी की श्रेणी
उपाय
तरीका, रास्ता
चबाना
दाँतों से काटना
इस भाग में मोती अत्याचार से परेशान होकर विद्रोह करना चाहता है। वह क्रोध में किसी को सींगों पर उठाने की बात करता है, लेकिन हीरा उसे नैतिकता और करुणा की याद दिलाता है। हीरा नहीं चाहता कि उनकी वजह से रोटियाँ खिलाने वाली बालिका पर कोई संकट आए। अंत में दोनों भागने की योजना बनाते हैं और रस्सी चबाकर तोड़ने का प्रयास करते हैं। यह अंश क्रोध, करुणा और स्वतंत्रता की इच्छा का मिश्रित चित्र प्रस्तुत करता है।
11 गद्य खंड 11
सहसा घर का द्वार खुला और वही लड़की निकली। दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूँछें खड़ी हो गईं। उसने उनके माथे सहलाए और बोली- "खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ, नहीं तो यहाँ लोग तुम्हें मार डालेंगे। आज घर में सलाह हो रही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाएँ।" उसने गाँव खोल दिया, पर दोनों चुपचाप खड़े रहे। मोती ने अपनी भाषा में पूछा- "अब चलते क्यों नहीं?" हीरा ने कहा- "चलें तो, लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे।" सहसा बालिका चिल्लाई "दोनों फूफावाले बैल भागे जा रहे हैं। ओ दादा ! दादा ! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौड़ो।" गया हड़बड़ाकर भीतर से निकला और बैलों को पकड़ने चला। वे दोनों भागे। गया ने पीछा किया। वह और भी तेज हुए। गया ने शोर मचाया। फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया। सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे। तब दोनों एक खेत के किनारे खड़े होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए।
हीरा ने कहा- "मालूम होता है, राह भूल गए।"
"तुम भी बेतहाशा भागे। वहीं उसे मार गिराना था।"
"उसे मार गिराते, तो दुनिया क्या कहती? वह अपना धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें?"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
सहसा
अचानक
नाथ
नाक में डाला जाने वाला लोहे का काँटा
आफत
मुसीबत
हड़बड़ाकर
घबराकर, जल्दी में
बेतहाशा
बिना सोचे-समझे, बेतरतीब
धर्म
अपना नियम/कर्तव्य
इस अंश में छोटी बालिका की बुद्धिमानी और करुणा सामने आती है। वह बैलों की रस्सी खोल देती है, लेकिन उनकी सुरक्षा और अपने ऊपर शक न आए, इसके लिए शोर भी मचा देती है। हीरा बालिका के भविष्य की चिंता करता है, जिससे उसकी संवेदनशीलता स्पष्ट होती है। दोनों बैल भाग तो जाते हैं, पर रास्ता भूल जाते हैं। यह भाग बताता है कि प्रेम करने वाला जीव दूसरों के दुख का भी विचार करता है।
12 गद्य खंड 12
दोनों भूख से व्याकुल हो रहे थे। खेत में मटर खड़ी थी। चरने लगे। रह-रहकर आहट ले लेते थे, कोई आता तो नहीं है। जब पेट भर गया और दोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे। पहले दोनों ने डकार ली। फिर सींग मिलाए और एक-दूसरे को ठेलने लगे। मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हटा दिया, यहाँ तक कि वह एक खाई में गिर गया। तब उसे भी क्रोध आया। संभलकर उठा और फिर मोती से भिड़ गया। मोती ने देखा खेल में झगड़ा हुआ चाहता है तो किनारे हट गया। अरे! यह क्या? कोई साँड़ डौंकता चला आ रहा है। हाँ, साँड़ ही है। वह सामने आ पहुँचा। दोनों मित्र बगलें झाँक रहे हैं। साँड़ पूरा हाथी है। उससे भिड़ना जान से हाथ धोना है; लेकिन न भिड़ने पर भी तो जान बचती नहीं नजर आती। इन्हीं की तरफ आ भी रहा है। कितनी भयंकर सूरत है!
मोती ने मूक-भाषा में कहा- "बुरे फंसे। जान बचेगी? कोई उपाय सोचो।"
हीरा ने चिंतित स्वर में कहा- "अपने घमंड में भूला हुआ है। आरजू-विनती न सुनेगा।"
"भाग क्यों न चलें?"
"भागना कायरता है।"
तो नौ-दो. "तो फिर यहीं मरो। बंदा तो नौ-दो ग्यारह होता है।"
"और जो दौड़ाए?"
"तो फिर कोई उपाय सोचो जल्द !"
"उपाय यही है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी, तो भाग खड़ा होगा। मेरी ओर झपटे, तुम बगल से उसके पेट में सींग घुसेड़ देना। जान जोखिम है; पर दूसरा उपाय नहीं है।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
व्याकुल
बेचैन, परेशान
आहट
आवाज़ की जाँच
डकार
पेट भरने पर निकलने वाली आवाज़
डौंकता
तेज़ी से चलता हुआ
बगलें झाँकना
डर से पसीना छूटना
आरजू-विनती
प्रार्थना, विनती
कायरता
डरपोकपन, बुज़दिली
रगेदना
सींग से मारना
जोखिम
खतरा
इस भाग में भूख, स्वतंत्रता और संकट तीनों स्थितियाँ एक साथ आती हैं। बैल मटर के खेत में चरकर कुछ राहत पाते हैं और आजादी का आनंद महसूस करते हैं। इसी बीच एक विशाल साँड़ सामने आ जाता है, जिससे उनका जीवन खतरे में पड़ जाता है। भागना उन्हें कायरता लगता है, इसलिए वे मिलकर सामना करने की योजना बनाते हैं। यह अंश एकता, साहस और संकट में समझदारी का सुंदर उदाहरण है।
13 गद्य खंड 13
पर उसने एक न सामने मटर का खेत था ही। मोती उसमें घुस गया। हीरा मना करता सुनी। अभी दो ही चार ग्रास खाए थे कि दो आदमी लाठियाँ लिए दौड़ पड़े और दोनों मित्रों को घेर लिया। हीरा तो मेड़ पर था, निकल गया। मोती सींचे हुए खेत में था। उसके खुर कीचड़ में धँसने लगे। न भाग सका। पकड़ लिया गया। हीरा ने देखा, संगी संकट में है, तो लौट पड़ा। फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे। रखवालों ने उसे भी पकड़ लिया। प्रातःकाल दोनों मित्र काँजीहौस में बंद कर दिए गए।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
ग्रास
एक बार में खाया जाने वाला मुँह भर
मेड़
खेत की सीमा की मिट्टी
खुर
पैर का निचला हिस्सा
संगी
साथी, मित्र
काँजीहौस
मवेशीखाना, पशुशाला
इस अंश में मोती की जल्दबाजी दोनों मित्रों को नए संकट में डाल देती है। वह मटर के खेत में चला जाता है और रखवालों द्वारा पकड़ा जाता है। हीरा बच सकता था, पर वह अपने साथी को संकट में छोड़कर नहीं जाता। वह लौट आता है और दोनों कांजीहौस में बंद कर दिए जाते हैं। यह भाग सच्ची मित्रता और साथ निभाने की भावना को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रकट करता है।
14 गद्य खंड 14
दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा स्वामी है। इससे तो गया फिर भी अच्छा था। यहाँ कई भैंसें थीं, कई बकरियाँ, कई घोड़े, कई गधे; पर किसी के सामने चारा न था, सब जमीन पर मुरदों की तरह पड़े थे। कई तो इतने कमजोर हो गए थे कि खड़े भी न हो सकते थे। सारा दिन दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए ताकते रहे; पर कोई चारा लेकर आता न दिखाई दिया। तब दोनों ने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की, पर इससे क्या तृप्ति होती?
रात को भी जब कुछ भोजन न मिला, तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला- "अब तो नहीं रहा जाता मोती!"
मोती ने सिर लटकाए हुए जवाब दिया- "मुझे तो मालूम होता है, प्राण निकल रहे हैं।"
"इतनी जल्द हिम्मत न हारो भाई! यहाँ से भागने का कोई उपाय निकालना चाहिए।"
"आओ दीवार तोड़ डालें।"
"मुझसे तो अब कुछ नहीं होगा।"
"बस इसी बूते पर अकड़ते थे!"
"सारी अकड़ निकल गई।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
साबिका
अनुभव
तिनका
घास-फूस की एक पत्ती
मुरदा
लाश, मरा हुआ
टकटकी
एकटक देखना
तृप्ति
संतोष, पेट भरना
ज्वाला
आग की लपट
अकड़
अभिमान, घमंड
यहाँ कांजीहौस की अमानवीय स्थिति का चित्रण है। वहाँ बंद पशुओं को भोजन नहीं दिया जाता और वे निर्बल होकर पड़े रहते हैं। हीरा और मोती भी भूख से व्याकुल होकर दीवार की मिट्टी चाटने लगते हैं। रात होते-होते हीरा के भीतर विद्रोह की भावना जाग उठती है। यह अंश अन्यायपूर्ण व्यवस्था और उसके विरुद्ध उठते प्रतिरोध को दिखाता है।
15 गद्य खंड 15
दीवार में गड़ा दिए बाड़े की दीवार कच्ची थी। हीरा मजबूत तो था ही, अपने नकीले सींग दीवार और जोर मारा, तो मिट्टी का एक चिप्पड़ निकल आया। फिर तो उसका साहस बढ़ा। उसने दौड़-दौड़कर दीवार पर चोटें कीं और हर चोट में थोड़ी-थोड़ी मिट्टी गिराने लगा। उसी समय काँजीहौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरों की हाजिरी लेने आ निकला। हीरा का यह उजड्डपन देखकर उसने उसे कई डंडे रसीद किए और मोटी-सी रस्सी से बाँध दिया।
मोती ने पड़े-पड़े कहा- "आखिर मार खाई, क्या मिला?"
"अपने बूते-भर जोर तो मार दिया।"
"ऐसा जोर मारना किस काम का कि और बंधन में पड़ गए।"
"जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।"
"जान से हाथ धोना पड़ेगा।"
"कुछ परवाह नहीं। यों भी तो मरना ही है। सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जानें बच जातीं। इतने भाई यहाँ बंद हैं। किसी की देह में जान नहीं है। दो-चार दिन और यही हाल रहा तो सब मर जाएँगे।"
"हाँ, यह बात तो है। अच्छा, तो ला, फिर मैं भी जोर लगाता हूँ।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
नकीले
नुकीले, तेज़
चिप्पड़
मिट्टी का टुकड़ा
चोट
वार, मार
उजड्डपन
शरारत, बदतमीज़ी
रसीद
मारना, देना
बूते-भर
अपनी क्षमता अनुसार
परवाह
फिक्र, चिंता
इस भाग में हीरा का संघर्ष और साहस दिखाई देता है। भूख और बंधन के बावजूद वह बाड़े की कच्ची दीवार तोड़ने का प्रयास करता है। चौकीदार उसे मारकर फिर बाँध देता है, लेकिन हीरा हार नहीं मानता। वह अपनी मुक्ति से अधिक अन्य बंद पशुओं की जान बचाने की चिंता करता है। यह अंश त्याग, साहस और सामूहिक मुक्ति की भावना को सामने लाता है।
16 गद्य खंड 16
मोती ने भी दीवार में उसी जगह सींग मारा। थोड़ी-सी मिट्टी गिरी और फिर हिम्मत बढ़ी। फिर तो वह दीवार में सींग लगाकर इस तरह जोर करने लगा, मानो किसी प्रतिद्वंद्वी से लड़ रहा है। आखिर कोई दो घंटे की जोर-आजमाई के बाद दीवार ऊपर से लगभग एक हाथ गिर गई। उसने दूनी शक्ति से दूसरा धक्का मारा, तो आधी दीवार गिर पड़ी। दीवार का गिरना था कि अधमरे-से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठे। तीनों घोड़ियाँ सरपट भाग निकलीं। फिर बकरियाँ निकलीं। इसके बाद भैंसें भी खिसक गईं; पर गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।
हीरा ने पूछा- "तुम दोनों क्यों नहीं भाग जाते?"
एक गधे ने कहा- "जो कहीं फिर पकड़ लिए जाएँ!"
"तो क्या हरज है। अभी तो भागने का अवसर है।"
"हमें तो डर लगता है, हम यहीं पड़े रहेंगे।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
प्रतिद्वंद्वी
प्रतियोगी, विरोधी
जोर-आजमाई
शक्ति का प्रयोग
दूनी
दोगुनी
अधमरे
मरने के करीब
सरपट
तेज़ी से
खिसकना
चुपचाप निकल जाना
ज्यों-के-त्यों
वैसे का वैसा
हरज
नुकसान
यहाँ मोती भी हीरा के संकल्प से प्रेरित होकर दीवार तोड़ने में लग जाता है। लगातार प्रयास के बाद दीवार गिर जाती है और कई बंद पशु बाहर निकल जाते हैं। घोड़ियाँ, बकरियाँ और भैंसें अवसर मिलते ही भाग जाती हैं। परंतु गधे डर के कारण वहीं खड़े रहते हैं, जबकि उनके सामने स्वतंत्रता का रास्ता खुला होता है। यह अंश दिखाता है कि स्वतंत्रता पाने के लिए साहस भी जरूरी है।
17 गद्य खंड 17
आधी रात से ऊपर जा चुकी थी। दोनों गधे अभी तक खड़े सोच रहे थे कि भागें या न भागें और मोती अपने मित्र की रस्सी तोड़ने में लगा हुआ था। जब वह हार गया, तो हीरा ने कहा- "तुम जाओ, मुझे यहीं पड़ा रहने दो। शायद कहीं भेंट हो जाए।" मोती ने आँखों में आँसू लाकर कहा- "तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो, हीरा? हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे हैं। आज तुम विपत्ति में पड़ गए, तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ।" हीरा ने कहा- "बहुत मार पड़ेगी। लोग समझ जाएँगे यह तुम्हारी शरारत है।" मोती गर्व से बोला- "जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बंधन पड़ा, उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े, तो क्या चिंता। इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।"यह कहते हुए मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार-मारकर बाड़े के बाहर निकाला और तब अपने बंधु के पास आकर सो रहा।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
भेंट
मुलाकात
स्वार्थी
अपने फायदे वाला
विपत्ति
मुसीबत
बंधन
रस्सी, बेड़ी
अपराध
गुनाह
आशीर्वाद
भला कहना, वरदान
बंधु
भाई, मित्र
इस भाग में मोती की मित्रता अपने चरम रूप में दिखाई देती है। वह हीरा की रस्सी तोड़ने की पूरी कोशिश करता है, लेकिन सफल नहीं होता। हीरा उसे अकेले भाग जाने को कहता है, पर मोती अपने मित्र को छोड़ना स्वीकार नहीं करता। वह कहता है कि यदि दंड मिलेगा तो वह भी साथ सह लेगा। यह अंश सच्चे मित्र के त्याग, निष्ठा और आत्मीयता को अत्यंत भावुक रूप में प्रस्तुत करता है।
18 गद्य खंड 18
भोर होते ही मुंशी और चौकीदार तथा अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली मची, इसके लिखने की जरूरत नहीं। बस, इतना ही काफी है कि मोती की खूब मरम्मत हुई और उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गए।
एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहाँ बँधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक तृण भी न डाला। हाँ, एक बार पानी दिखा दिया जाता था। यही उनका आधार था। दोनों इतने दुर्बल हो गए थे कि उठा तक न जाता था; ठठरियाँ निकल आई थीं।
एक दिन बाड़े के सामने डुग्गी बजने लगी और दोपहर होते-होते वहाँ पचास-साठ आदमी जमा हो गए। तब दोनों मित्र निकाले गए और उनकी देखभाल होने लगी। लोग आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते। ऐसे मृतक बैलों का कौन खरीदार होता?
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
खलबली
हड़कंप, हलचल
मरम्मत
मार, पिटाई
तृण
घास का एक तिनका
ठठरियाँ
काँपने की बीमारी
डुग्गी
ढोल, नगाड़ा
सूरत
चेहरा, हालत
मृतक
मरा हुआ
इस अंश में कांजीहौस की क्रूरता और बैलों की दयनीय स्थिति सामने आती है। दीवार टूटने की घटना के बाद मोती को भी खूब पीटा जाता है और बाँध दिया जाता है। एक सप्ताह तक उन्हें चारा नहीं मिलता, केवल थोड़ा पानी ही उनका सहारा रहता है। भूख और कमजोरी से उनकी हालत बहुत खराब हो जाती है। अंत में उन्हें नीलामी के लिए बाहर निकाला जाता है, पर उनकी दशा देखकर लोग पीछे हट जाते हैं।
19 गद्य खंड 19
सहसा एक दढ़ियल आदमी, जिसकी आँखें लाल थीं और मुद्रा अत्यंत कठोर, आया और दोनों मित्रों के कूल्हों में उँगली गोदकर मुंशी जी से बातें करने लगा। उसका चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे। वह कौन है और उन्हें क्यों टटोल रहा है, इस विषय में उन्हें कोई संदेह न हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को भीत नेत्रों से देखा और सिर झुका लिया।
हीरा ने कहा- "गया के घर से नाहक भागे। अब जान न बचेगी।"
मोती ने अश्रद्धा के भाव से उत्तर दिया- "कहते हैं, भगवान सबके ऊपर दया करते हैं। उन्हें हमारे ऊपर क्यों दया नहीं आती।"
"भगवान के लिए हमारा मरना-जीना दोनों बराबर है। चलो, अच्छा ही है, कुछ उसके पास तो रहेंगे। एक बार भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएँगे?"
"यह आदमी छुरी चलाएगा। देख लेना।"
"तो क्या चिंता है? माँस, खाल, सींग, हड्डी सब किसी-न-किसी काम आ जाएँगी।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
दढ़ियल
कसाई, बूचड़खाने वाला
मुद्रा
चेहरे का भाव
कूल्हों
कमर के नीचे का हिस्सा
टटोलना
जाँचना, छूकर देखना
अंतर्ज्ञान
अंदर से आने वाला ज्ञान
भीत नेत्रों
अंदर की आँखों से
नाहक
बेकार, बिना वजह
अश्रद्धा
विश्वास न करना
यहाँ बैलों के सामने मृत्यु का भय उपस्थित होता है। एक कठोर चेहरा वाला दढ़ियल व्यक्ति उन्हें देखने आता है और दोनों समझ जाते हैं कि वह कसाई है। उनकी आँखों में भय और मन में निराशा भर जाती है। मोती भगवान की दया पर प्रश्न उठाता है, जबकि हीरा परिस्थिति को स्वीकार करने की कोशिश करता है। यह अंश असहाय जीवों की पीड़ा और मृत्यु-बोध को मार्मिक रूप से व्यक्त करता है।
20 गद्य खंड 20
नीलाम हो जाने के बाद दोनों मित्र उस दढ़ियल के साथ चले। दोनों की बोटी-बोटी काँप रही थी। बेचारे पाँव तक न उठा सकते थे, पर भय के मारे गिरते-पड़ते भागे जाते थे; क्योंकि वह ज़रा भी चाल धीमी हो जाने पर जोर से डंडा जमा देता था। राह में गाय-बैलों का एक रेवड़ हरे-हरे हार में चरता नजर आया। सभी जानवर प्रसन्न थे, चिकने, चपल। कोई उछलता था, कोई आनंद से बैठा पागुर करता था। कितना सुखी जीवन था इनका; पर कितने स्वार्थी हैं सब। किसी को चिंता नहीं कि उनके दो भाई बधिक के हाथ पड़े कैसे दुखी हैं।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
नीलाम
बोली लगाकर बेचना
बोटी-बोटी
हड्डी-हड्डी
रेवड़
झुंड, समूह
हार
खेत की सीमा
चपल
फुर्तीला
पागुर
जमीन पर लोटना-पोटना
बधिक
कसाई, जानवर मारने वाला
इस भाग में नीलामी के बाद दोनों बैलों की असहाय यात्रा दिखाई गई है। कसाई उन्हें डंडे मारते हुए ले जाता है, जबकि वे अत्यंत कमजोर हैं। रास्ते में वे हरे चारे में चरते सुखी पशुओं को देखते हैं और अपनी स्थिति से उनकी तुलना करते हैं। लेखक यहाँ समाज की स्वार्थी प्रवृत्ति पर संकेत करते हैं, जहाँ अपने जैसे पीड़ितों की भी चिंता नहीं की जाती। यह अंश करुणा और सामाजिक उदासीनता को उजागर करता है।
21 गद्य खंड 21
सहसा दोनों को ऐसा मालूम हुआ कि यह परिचित राह है। हाँ, इसी रास्ते से गया उन्हें ले गया था। वही खेत, वही बाग, वही गाँव मिलने लगे। प्रतिक्षण उनकी चाल तेज होने लगी। सारी थकान, सारी दुर्बलता गायब हो गई। आह? यह लो! अपना ही हार आ गया। इसी कुएँ पर हम पुर चलाने आया करते थे; यही कुआँ है।
मोती ने कहा- "हमारा घर नगीच आ गया।"
हीरा बोला- "भगवान की दया है।"
"मैं तो अब घर भागता हूँ।"
"यह जाने देगा?"
"इसे मैं मार गिराता हूँ।"
"नहीं-नहीं, दौड़कर थान पर चलो। वहाँ से हम आगे न जाएँगे।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
प्रतिक्षण
हर पल
नगीच
नज़दीक
थान
बाँधने की जगह
इस अंश में आशा का नया प्रकाश दिखाई देता है। दोनों बैलों को अचानक रास्ता परिचित लगने लगता है और वे समझ जाते हैं कि उनका घर निकट है। अपनी धरती, खेत और कुएँ को पहचानकर उनकी सारी थकान दूर हो जाती है। घर की याद उनमें नई शक्ति भर देती है। यह भाग बताता है कि अपनापन और घर का आकर्षण निराश जीव में भी जीवन-ऊर्जा पैदा कर देता है।
22 गद्य खंड 22
दोनों उन्मत्त होकर बछड़ों की भाँति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौड़े। वह हमारा थान है। दोनों दौड़कर अपने थान पर आए और खड़े हो गए। दढ़ियल भी पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था।
झूरी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था। बैलों को देखते ही दौड़ा और उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा। मित्रों की आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे। एक झूरी का हाथ चाट रहा था।
दढ़ियल ने जाकर बैलों की रस्सियाँ पकड़ लीं।
झूरी ने कहा- मेरे बैल हैं।
"तुम्हारे बैल कैसे? मैं मवेशीखाने से नीलाम लिए आता हूँ।"
"मैं तो समझता हूँ चुराए लिए आते हो! चुपके से चले जाओ। मेरे बैल हैं। मैं नहीं बिकने दूँगा। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख़्तियार है?"
"जाकर थाने में रपट कर दूँगा।"
"मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
उन्मत्त
पागलों की तरह उतावला
बछड़ों की भाँति
बछड़े की तरह
कुलेलें
उछल-कूद
अख़्तियार
हक़, अधिकार
रपट
रिपोर्ट, शिकायत
सबूत
प्रमाण
यहाँ हीरा और मोती की घर वापसी का भावपूर्ण दृश्य है। दोनों अपने थान पर पहुँच जाते हैं और झूरी उन्हें देखकर अत्यंत प्रसन्न हो उठता है। वह उन्हें गले लगाता है और बैलों की आँखों से भी आनंद के आँसू बहते हैं। कसाई उन्हें अपना बताकर ले जाना चाहता है, लेकिन झूरी दृढ़ता से उनका पक्ष लेता है। यह अंश स्वामी और पशु के बीच गहरे प्रेम और अधिकार-बोध को दिखाता है।
23 गद्य खंड 23
दढ़ियल झल्लाकर बैलों को जबरदस्ती पकड़ ले जाने के लिए बढ़ा। सींग चलाया। दढ़ियल पीछे हटा। मोती ने पीछा किया। दढ़ियल भागा। मोती पीछे दौड़ा। गाँव के बाहर निकल जाने पर वह रुका; पर खड़ा दढ़ियल का रास्ता देख रहा था। दढ़ियल दूर खड़ा धमकियाँ दे रहा था, गालियाँ निकाल रहा था, पत्थर फेंक रहा था। और मोती विजयी शूर की भाँति उसका रास्ता रोके खड़ा था। गाँव के लोग यह तमाशा देखते थे और हँसते थे।
जब दढ़ियल हारकर चला गया, तो मोती अकड़ता हुआ लौटा।
हीरा ने कहा- "मैं डर रहा था कि कहीं तुम गुस्से में आकर मार न बैठो।"
"अगर वह मुझे पकड़ता, तो मैं बे-मारे न छोड़ता।"
"अब न आएगा।"
"आएगा तो दूर ही से खबर लूँगा। देखूँ, कैसे ले जाता है।"
"जो गोली मरवा दे? "
"मर जाऊँगा; पर उसके काम तो न आऊँगा।"
"हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।"
"इसीलिए कि हम इतने सीधे हैं।"
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
झल्लाकर
गुस्से में आकर
जबरदस्ती
ज़ोर-ज़बरदस्ती
धमकियाँ
डराने की बातें
विजयी शूर
जीतने वाला बहादुर
तमाशा
खेल, दृश्य
अकड़ता
गर्व से
इस भाग में मोती का साहस और आत्मसम्मान खुलकर सामने आता है। जब कसाई जबरदस्ती बैलों को ले जाने का प्रयास करता है, तो मोती उसका डटकर सामना करता है। वह उसे गाँव से बाहर तक खदेड़ देता है और विजयी योद्धा की तरह खड़ा रहता है। हीरा उसकी मर्यादा को लेकर चिंतित रहता है, लेकिन मोती अब अपने अधिकार की रक्षा के लिए तैयार है। यह अंश बताता है कि अत्याचार के सामने आत्मरक्षा भी आवश्यक हो जाती है।
24 गद्य खंड 24
ज़रा देर में नाँदों में खली, भूसा, चोकर और दाना भर दिया गया और दोनों मित्र खाने लगे। झूरी खड़ा दोनों को सहला रहा था और बीसों लड़के तमाशा देख रहे थे। सारे गाँव में उछाह-सा मालूम होता था।
उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए।
📚 कठिन शब्दों के अर्थ
शब्द
अर्थ
नाँद
जानवरों की थाली
सहलाना
प्यार से सिर पर हाथ फेरना
उछाह
खुशी, उत्साह
मालकिन
घर की मालकिन, झूरी की पत्नी
अंतिम अंश में संघर्ष के बाद प्रेम और अपनापन फिर से लौट आता है। नाँदों में अच्छा चारा भर दिया जाता है और दोनों बैल शांति से खाने लगते हैं। झूरी उन्हें प्यार से सहलाता है और गाँव के लोग इस दृश्य को देखते हैं। मालकिन भी पहले की कठोरता भूलकर उनके माथे चूम लेती है। इस प्रकार कहानी का अंत करुणा, घर-वापसी और प्रेमपूर्ण मिलन के साथ होता है।
5
💡 पाठ से सीख (Moral Lessons)
🕊️ स्वतंत्रता का महत्व
स्वतंत्रता सहज ही नहीं मिलती, इसके लिए बार-बार कड़ा संघर्ष करना पड़ता है। बैलों ने कई कष्ट सहे पर अपनी आजादी के लिए लड़ते रहे। यह परोक्ष रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भावना है।
🤝 सच्ची मित्रता
हीरा और मोती की मित्रता देखने लायक थी। संकट के समय दोनों एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते। मोती हीरा को रस्सी में बँधा देखकर भी नहीं भागा। सच्चा मित्र विपत्ति में साथ देता है।
✊ अन्याय के विरुद्ध आवाज़
अन्याय सहन न करो। गया के अत्याचार के विरुद्ध बैलों ने विद्रोह किया। काँजीहौस में भी उन्होंने दीवार तोड़कर विद्रोह किया और कई जानवरों की जान बचाई।
❤️ करुणा और प्रेम
भैरो की बेटी जैसी छोटी बच्ची ने भी बैलों पर दया दिखाई। यह सिखाता है कि प्रेम और करुणा का कोई वर्ग-भेद नहीं होता। दयालुता सभी में होनी चाहिए।
⚖️ धर्म और अहिंसा
हीरा ने हमेशा अहिंसा का पाठ पढ़ाया। उसने कहा कि कसाई को मारना उनका धर्म नहीं है। सीधापन और सहनशीलता भी एक ताकत है, कमजोरी नहीं।
🏠 घर की ममता
बैल कितनी भी दूर चले जाएँ, अपने घर और मालिक की याद आती ही रही। अंत में वे अपने घर लौट आए। घर की ममता सबसे ऊपर होती है।
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⭐ महत्वपूर्ण तथ्य
लेखक परिचय: मुंशी प्रेमचंद का जन्म सन् 1880 में उत्तर प्रदेश के वाराणसी के पास लमही गाँव में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय था। उन्होंने असहयोग आंदोलन में भाग लेने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ दी।
प्रमुख रचनाएँ: गोदान, गबन, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, मानसरोवर (कहानी संग्रह)। वे किसान, मज़दूर, दलित और स्त्रियों से जुड़े विषयों पर लिखते थे। सन् 1936 में उनका निधन हो गया।
स्वतंत्रता संग्राम से संबंध: यह कहानी परोक्ष रूप से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भावना को रेखांकित करती है। बैलों का संघर्ष आज़ादी के लिए किए गए संघर्ष का प्रतीक है।
पात्र परिचय: हीरा और मोती दोनों बैलों के नाम हैं। झूरी उनका मालिक है। गया झूरी का साला है जो बैलों के साथ क्रूरता करता है। भैरो की बेटी एक अनाथ लड़की है जो बैलों की मदद करती है।
कांजीहौस: कहानी में 'कांजीहौस' शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है मवेशीखाना या पशुशाला जहाँ आवारा पशुओं को रखा जाता है।
मूक-भाषा: कहानी में बैलों के बीच 'मूक-भाषा' का प्रयोग दिखाया गया है जो बिना शब्दों के भावनाओं का आदान-प्रदान है।
मार्मिक दृश्य: जब बैल भागकर वापस आते हैं तो झूरी उन्हें गले लगाता है और अंत में मालकिन उनके माथे चूमती है। यह मनुष्य और पशु के बीच के भावनात्मक संबंध को दर्शाता है।
सामाजिक संदेश: कहानी यह संदेश देती है कि सीधे और सहनशील लोगों का संसार में अनादर होता है, फिर भी अपने धर्म और मूल्यों से नहीं हटना चाहिए।
📝 बोधात्मक प्रश्न
प्रश्न 1. हीरा और मोती में कैसी मित्रता थी?
हीरा और मोती में गहरी आत्मीयता और सच्ची मित्रता थी। वे संकट में भी एक-दूसरे का साथ नहीं छोड़ते थे।
प्रश्न 2. गया के घर जाकर बैलों को कैसा अनुभव हुआ?
गया के घर उन्हें पराया वातावरण, मार-पीट और सूखा भूसा मिला। इसलिए दोनों बैलों के मन में विद्रोह की भावना जाग उठी।
प्रश्न 3. भैरो की बेटी का चरित्र कैसा है?
भैरो की बेटी दयालु और सहानुभूतिपूर्ण है। वह स्वयं दुख सहती है, इसलिए बैलों के कष्ट को समझकर उनकी सहायता करती है।
📚 NCERT प्रश्नोत्तर
प्रश्न 1. काँजीहौस में हीरा और मोती ने क्या किया?
काँजीहौस में दोनों बैलों ने भूख और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष किया। उन्होंने दीवार तोड़कर कई पशुओं को बाहर निकलने का अवसर दिया।
प्रश्न 2. कहानी का मुख्य संदेश क्या है?
कहानी का मुख्य संदेश है कि स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और सच्ची मित्रता जीवन के महत्वपूर्ण मूल्य हैं। अन्याय के सामने चुप रहना उचित नहीं है।
प्रश्न 3. हीरा और मोती अपने घर कैसे पहुँचे?
नीलामी के बाद कसाई उन्हें ले जा रहा था। रास्ते में उन्होंने अपना परिचित गाँव पहचान लिया और दौड़कर झूरी के घर पहुँच गए।
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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
दो बैलों की कथा के लेखक कौन हैं?
इस कहानी के लेखक मुंशी प्रेमचंद हैं, जो हिंदी साहित्य के महान कथाकार माने जाते हैं। उनका मूल नाम धनपत राय था।
हीरा और मोती कौन हैं?
हीरा और मोती झूरी नामक किसान के दो बैल हैं। दोनों में गहरा भाईचारा और आपसी प्रेम है। वे बिना बोले एक-दूसरे को समझ जाते हैं।
झूरी ने बैलों को ससुराल क्यों भेजा?
झूरी ने अपने साले गया की मदद के लिए बैलों को कुछ दिनों के लिए ससुराल भेजा था। बैलों को लगा कि उन्हें बेच दिया गया है।
गया ने बैलों के साथ कैसा व्यवहार किया?
गया बैलों के साथ बहुत क्रूर था। उसने उन्हें मारा-पीटा, मोटी रस्सियों से बाँधा, सूखा भूसा खिलाया और बिना चारे-दाने के रखा।
भैरो की बेटी ने बैलों की कैसे मदद की?
भैरो की अनाथ बेटी रोज़ रात को दो रोटियाँ लाकर बैलों को खिलाती थी। एक रात उसने उनकी रस्सी खोलकर भागने में मदद भी की।
बैल कांजीहौस से क्यों भेजे गए?
बैल मटर के खेत में चरते हुए पकड़े गए। रखवालों ने उन्हें कांजीहौस (मवेशीखाने) में बंद कर दिया जहाँ उन्हें भूखा रखा गया।
कांजीहौस में बैलों ने क्या किया?
कांजीहौस में बैलों ने भूख से तड़पते हुए दीवार तोड़ दी। इससे कई जानवर भाग निकले। मोती ने अपने मित्र हीरा को अकेला नहीं छोड़ा।
कहानी का अंत कैसे हुआ?
बैल कसाई के हाथों बिककर जा रहे थे कि रास्ते में उन्होंने अपना गाँव पहचान लिया। वे भागकर झूरी के पास पहुँचे। मोती ने कसाई को खदेड़ दिया। झूरी और मालकिन ने उन्हें प्यार से गले लगाया।
इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष आवश्यक है, सच्ची मित्रता कभी नहीं टूटती, अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए और सीधापन भी एक गुण है।
'दो बैलों की कथा' का मुख्य संदेश क्या है?
मुख्य संदेश यह है कि स्वतंत्रता सहज नहीं मिलती, इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। साथ ही यह कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की भावना को दर्शाती है और मनुष्य-पशु के प्रेम को उजागर करती है।
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BY
BEBO Yadav
शिक्षक का धर्म है सिखाना और विद्यार्थी का धर्म है सीखना।
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