1. लेखक परिचय
लीलाधर मंडलोई का जन्म 1954 में मध्यप्रदेश में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भोपाल और रायपुर में संपन्न हुई। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं और दूरदर्शन (प्रसार भारती) में एक उच्च अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएँ दे चुके हैं। मुख्य रूप से एक कवि होने के बावजूद, उन्होंने गद्य, लोककथाओं और यात्रा-वृत्तांतों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। मंडलोई जी की रचनाओं में ग्रामीण जीवन, लोक-संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं की बहुत ही सहज झलक देखने को मिलती है। 'घर-घर घूमा', 'रात-बिरात', 'मगर एक आवाज', 'देखा-अनदेखा' और 'काला पानी' इनकी कुछ अत्यंत प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। इनकी भाषा-शैली इतनी सरल और भावपूर्ण होती है कि पाठक कहानी की गहराई से सीधा जुड़ जाता है
2. पाठ में प्रवेश
दुनिया के हर समाज में अपनी कुछ प्राचीन लोककथाएँ और कहानियाँ होती हैं। ये कहानियाँ केवल हमारा मनोरंजन करने के लिए नहीं बुनी जातीं, बल्कि इनके भीतर जीवन के गहरे संदेश और पीढ़ियों की सीख छिपी होती है। भारत के अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में भी अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं। लेखक लीलाधर मंडलोई ने इसी द्वीपसमूह की एक बहुत ही प्रसिद्ध और हृदयस्पर्शी लोककथा को "तताँरा–वामीरो कथा" के रूप में हमारे सामने बहुत ही सरल शब्दों में प्रस्तुत किया है
3. पाठ का सारांश
"तताँरा-वामीरो कथा" अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की एक प्रसिद्ध लोककथा है, जो सच्चे प्रेम, महान त्याग और समाज की कठोर रूढ़िवादी परंपराओं के बीच के टकराव को दर्शाती है। पहले कार-निकोबार और लिटिल अंडमान एक ही द्वीप हुआ करते थे। पासा गाँव में तताँरा नाम का एक बहुत ही दयालु, साहसी और मददगार युवक रहता था, जिसे पूरा द्वीप सम्मान देता था। उसके पास एक जादुई लकड़ी की तलवार थी
एक दिन समुद्र किनारे तताँरा ने लपाती गाँव की एक सुंदर लड़की वामीरो को एक मधुर गीत गाते हुए सुना और वह उसकी ओर खिंचता चला गया। दोनों के बीच धीरे-धीरे गहरा प्रेम पनपने लगा। लेकिन, उनके समाज का एक कड़ा नियम था कि विवाह केवल एक ही गाँव के लोगों के बीच हो सकता था। उनके प्रेम की भनक गाँव वालों को लग गई। पासा गाँव के 'पशु-पर्व' में जब वामीरो की माँ ने तताँरा को सरेआम अपमानित किया, तो तताँरा का क्रोध फूट पड़ा। अपनी बेबसी और गुस्से में तताँरा ने अपनी जादुई तलवार धरती में गाड़ दी और उसे खींचते हुए धरती को चीर डाला, जिससे द्वीप दो हिस्सों में बँट गया। इस भयानक घटना में तताँरा और वामीरो हमेशा के लिए बिछड़ गए और दोनों का जीवन दुःख में समाप्त हो गया। उनके इस महान त्याग ने समाज की आँखें खोल दीं, और निकोबारियों ने अपनी इस कठोर परंपरा को हमेशा के लिए बदलकर दूसरे गाँवों में भी वैवाहिक संबंध बनाने शुरू कर दिए
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4. गद्यांश, शब्दार्थ एवं व्याख्या (7-9 पंक्तियों में)
गद्यांश 1: अंदमान द्वीप समूह का अंतिम दक्षिणी द्वीप है लिटिल अंदमान। यह पोर्ट ब्लेयर से लगभग सौ किलोमीटर दूर स्थित है। इसके बाद निकोबार द्वीपसमूह की श्रृंखला आरम्भ होती है जो निकोबारी जनजाति की आदिम संस्कृति के केंद्र हैं। निकोबार द्वीपसमूह का पहला प्रमुख द्वीप है कार -निकोबार जो लिटिल अंदमान से 96 कि.मी. दूर है। निकोबारियों का विश्वास है कि प्राचीन काल में ये दोनों द्वीप एक ही थे। इनके विभक्त होने की एक लोककथा है,जो आज भी दोहराई जाती है।
  • कठिन शब्दार्थ: अंतिम - आखिरी, श्रृंखला - कड़ी/विस्तार, आदिम - बहुत पुरानी/प्राचीन, विभक्त - बँटा हुआ या अलग।
  • व्याख्या: प्रस्तुत गद्यांश में लेखक अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह की भौगोलिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से हमारा परिचय कराते हैं। वे बताते हैं कि अंडमान का सबसे दक्षिणी हिस्सा लिटिल अंडमान है, जो राजधानी पोर्ट ब्लेयर से सौ किलोमीटर की दूरी पर बसा है। यहीं से निकोबार द्वीपसमूह की शुरुआत होती है, जो पुरानी आदिवासी संस्कृति का मुख्य गढ़ माना जाता है। कार-निकोबार यहाँ का पहला प्रमुख द्वीप है, जिसकी लिटिल अंडमान से दूरी 96 किलोमीटर है। वहाँ के स्थानीय निवासियों का यह दृढ़ विश्वास है कि बहुत समय पहले ये दोनों अलग-अलग द्वीप न होकर एक ही बड़ा द्वीप हुआ करते थे। इन दोनों द्वीपों के बीच से टूटने और अलग होने के पीछे एक बहुत ही मार्मिक पुरानी कथा जुड़ी है। आज भी वहाँ के लोग इस कहानी को अपनी आने वाली पीढ़ियों को सुनाते हैं।
गद्यांश 2: सदियों पूर्व ,जब लिटिल अंदमान और कार -निकोबार आपस में जुड़े हुए थे तब वहाँ एक सुंदर सा गाँव था। पास में एक सुंदर और शक्तिशाली युवक रहा करता था। उसका नाम था तताँरा। निकोबारी उससे बेहद प्रेम करते थे। तताँरा एक नेक और मददगार व्यक्ति था। सदैव दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहता। अपने गाँव वालों को ही नहीं ,अपितु समूचे द्वीपवासियों की सेवा करना अपना परम कर्तव्य समझता था। उसके इस त्याग की वजह से वह चर्चित था। सभी उसका आदर करते। वक्त मुसीबत में उसे स्मरण करते और वह भागा -भागा वहाँ पहुँच जाता।
  • कठिन शब्दार्थ: सदियों पूर्व - बहुत सालों पहले, नेक - भला, तत्पर - तैयार, समूचे - संपूर्ण, स्मरण - याद करना।
  • व्याख्या: इस अंश में लेखक कहानी के मुख्य पात्र 'तताँरा' के प्रभावशाली व्यक्तित्व का वर्णन कर रहे हैं। प्राचीन काल में जब यह संपूर्ण द्वीप एक ही था, तब वहाँ एक बेहद खूबसूरत गाँव बसा हुआ था। उसी गाँव के करीब तताँरा नाम का एक बलिष्ठ और आकर्षक नौजवान रहता था, जो अपनी शारीरिक ताकत से ज्यादा अपने अच्छे स्वभाव के लिए जाना जाता था। तताँरा के हृदय में सबके लिए दया थी और वह निस्वार्थ भाव से हमेशा दूसरों की मदद करने को तैयार रहता था। उसके लिए केवल उसका अपना गाँव ही नहीं, बल्कि उस द्वीप पर रहने वाला हर एक व्यक्ति एक परिवार के समान था। तताँरा के इसी त्याग, परोपकार और सेवा भाव के कारण पूरे द्वीप के लोग उसे दिल से चाहते थे और उसका बहुत सम्मान करते थे। जब भी किसी पर कोई संकट आता, तो सबसे पहले तताँरा को ही पुकारा जाता था और वह भी बिना देरी किए लोगों की परेशानी दूर करने पहुँच जाता था।
गद्यांश 3: दूसरे गाँव में भी पर्व -त्योहारों के समय उसे विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता। उसका व्यक्तित्व तो आकर्षक था ही ,साथ ही आत्मीय स्वभाव की वजह से लोग उसके करीब रहना चाहते। पारम्परिक पोशाक के साथ वह अपनी कमर में सदैव एक लकड़ी की तलवार बाँधे रहता। लोगों का मत था ,बावजूद लकड़ी की होने पर, उस तलवार में अद्भुत दैवीय शक्ति थी। तताँरा अपनी तलवार को कभी अलग न होने देता। उसका दूसरों के सामने उपयोग भी न करता। किन्तु उसके चर्चित साहसिक कारनामों के कारण लोग -बाग तलवार में अद्भुत शक्ति का होना मानते थे। तताँरा की तलवार एक विलक्षण रहस्य थी।
  • कठिन शब्दार्थ: आत्मीय - अपनापन, अद्भुत - अनोखी/चमत्कारी, विलक्षण - अनोखा या विशेष, रहस्य - भेद/राज।
  • व्याख्या: लेखक बताते हैं कि तताँरा की लोकप्रियता केवल उसके अपने गाँव तक सीमित नहीं थी; आसपास के गाँवों के लोग भी उसे अपने उत्सवों और त्योहारों में आदरपूर्वक बुलाते थे। तताँरा का शरीर जितना सुगठित था, उसका स्वभाव उतना ही विनम्र और अपनत्व से भरा हुआ था, जिसके कारण लोग सहज ही उसकी ओर खिंचे चले आते थे। उसके पहनावे की एक खास बात यह थी कि वह अपनी पारंपरिक वेशभूषा के साथ हमेशा कमर में एक लकड़ी की तलवार टाँगे रहता था। यद्यपि वह तलवार सिर्फ लकड़ी की बनी थी, फिर भी स्थानीय लोगों का पक्का विश्वास था कि उसमें कोई जादुई और ईश्वरीय ताकत मौजूद है। तताँरा ने कभी भी किसी के सामने अपनी तलवार का प्रदर्शन नहीं किया और न ही कभी उसे अपने शरीर से अलग किया। लेकिन तताँरा द्वारा किए गए बहादुरी के कामों को देखकर लोगों का यह भ्रम और मजबूत हो गया था कि उसकी सारी शक्ति उस रहस्यमयी लकड़ी की तलवार में ही छिपी है।
गद्यांश 4: एक शाम तताँरा दिन भर के अथक परिश्रम के बाद समुद्र किनारे टहलने निकल पड़ा। सूरज समुद्र से लगे क्षितिज तले डूबने को था। समुद्र से ठंडी बयारें आ रही थी। पक्षियों की सांयकालीन चहचहाहटें शनैः शनैः क्षीण होने को थीं। उसका मन शांत था। विचारमग्न तताँरा समुद्री बालू पर बैठ कर सूरज की अंतिम रंग -बिरंगी किरणों को समुद्र पर निहारने लगा। तभी कहीं पास से उसे मधुर गीत गूँजता सुनाई दिया। गीत मानों बहता हुआ उसकी तरफ़ आ रहा हो। बीच -बीच में लहरों का संगीत सुनाई देता।
  • कठिन शब्दार्थ: अथक - बिना थके/निरंतर, क्षितिज - जहाँ धरती और आकाश मिलते दिखें, बयारें - ठंडी हवाएँ, शनैः शनैः - धीरे-धीरे, क्षीण - कम या कमजोर।
  • व्याख्या: यहाँ तताँरा के उस शाम के समय का चित्रण है जब वह दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद आराम करने के उद्देश्य से समुद्र के किनारे घूमने गया था। यह वह समय था जब सूरज ठीक उसी जगह डूब रहा था जहाँ से आसमान और पानी मिलते हुए प्रतीत होते हैं। समुद्र की तरफ से बहुत ही सुकून देने वाली ठंडी हवाएँ चल रही थीं और शाम ढलने के कारण पक्षियों का शोर भी धीरे-धीरे शांत हो रहा था। इस एकांत और शांत माहौल में तताँरा रेत पर बैठ गया और अपनी ही सोच में खोकर सूरज की डूबती हुई सतरंगी किरणों की खूबसूरती को देखने लगा। अचानक, इस सन्नाटे को चीरता हुआ एक बहुत ही मीठा और सुरीला गीत उसके कानों में पड़ा। वह गीत इतना मधुर था कि तताँरा को ऐसा महसूस हुआ जैसे हवा और समुद्र की लहरों के साथ मिलकर वह संगीत सीधे उसी के पास खिंचा चला आ रहा हो।
गद्यांश 5: गायन इतना प्रभावी था कि वह अपनी सुध बुध खोने लगा। लहरों के एक प्रबल वेग ने उसकी तन्द्रा भंग की। चैतन्य होते ही वह उधर बढ़ने को विवश हो उठा जिधर से अब भी गीत के स्वर बह रहे थे। वह विकल सा उस तरफ बढ़ता गया। अंततः उसकी नजर एक युवती पर पड़ी जो ढलती हुई शाम के सौंदर्य में बेसुध,एकटक समुद्र की देह पर डूबते आकर्षक रंगों को निहारते हुए गा रही थी। यह एक श्रृंगार गीत था।
  • कठिन शब्दार्थ: तन्द्रा - हल्की नींद या खुमारी की स्थिति, चैतन्य - होश में आना, विवश - मजबूर, विकल - बेचैन, बेसुध - बिना किसी सुध या होश के।
  • व्याख्या: लेखक बताते हैं कि उस अनजान युवती की आवाज़ में एक अजीब सा जादू था, जिसने तताँरा को पूरी तरह से सम्मोहित कर लिया था। उस गीत को सुनकर तताँरा बाहरी दुनिया को भूलकर एक नशे जैसी अवस्था में जा चुका था, जिसे समुद्र की एक तेज़ लहर की बौछार ने अचानक तोड़ दिया। जैसे ही तताँरा का ध्यान टूटा और वह होश में आया, उसके कदम खुद-ब-खुद उस दिशा की ओर खिंचने लगे जहाँ से वह मीठी आवाज़ आ रही थी। अत्यंत बेचैन मन के साथ आगे बढ़ते हुए आखिरकार तताँरा ने एक खूबसूरत लड़की को देखा। वह लड़की अपने आस-पास की दुनिया से पूरी तरह अनजान थी और समुद्र के पानी पर पड़ रही सूरज की डूबती किरणों को निहारते हुए एक प्रेम से भरा गीत गाने में पूरी तरह मग्न थी।
गद्यांश 6: उसे ज्ञात ही न हो सका कि कोई अजनबी युवक उसे निःशब्द ताके जा रहा है। एकाएक एक ऊँची लहर उठी और उसे भिगो गई। वह हड़बड़ाहट में गाना भूल गई। इसके पहले कि वह सामान्य हो पाती, उसने अपने कानों में गूँजती गंभीर आकर्षक आवाज़ सुनी। "तुमने एकाएक इतना मधुर गाना अधूरा क्यों छोड़ दिया?” तताँरा ने विनम्रतापूर्वक कहा। अपने सामने एक सुन्दर युवक को देखकर वह विस्मित हुई। उसके भीतर किसी कोमल भावना का संचार हुआ। किन्तु अपने को संयतकर उसने बेरुखी के साथ जवाब दिया। "पहले बताओ!तुम कौन हो ,इस तरह मुझे घूरने और इस असंगत प्रश्न का कारण ? अपने गाँव के अलावा किसी और गाँव के युवक के प्रश्नों का उत्तर देने को मैं बाध्य नहीं। यह तुम भी जानते हो।”
  • कठिन शब्दार्थ: निःशब्द - बिना कुछ बोले/चुपचाप, विस्मित - हैरान, संयत - काबू में करना, असंगत - बेतुका/अनुचित, बाध्य - मजबूर।
  • व्याख्या: उस युवती (वामीरो) को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि पीछे खड़ा एक अनजान युवक उसे बिना पलक झपकाए मुग्ध होकर देख रहा है। तभी समुद्र की एक बहुत बड़ी लहर आई और वह पूरी तरह से भीग गई, जिसकी हड़बड़ाहट में उसके मुँह से गीत के बोल निकलना बंद हो गए। जब तक वह खुद को सँभाल पाती, तताँरा ने एक बहुत ही भारी और आकर्षक आवाज़ में उससे पूछा कि उसने इतना मीठा गीत बीच में ही क्यों रोक दिया। पीछे मुड़कर एक सुंदर अजनबी को देखकर वामीरो पहले तो बहुत हैरान हुई और उसके मन में एक अजीब सी हलचल भी हुई। लेकिन अपने गाँव के नियमों को याद करते हुए उसने खुद को कठोर बनाया और नाराजगी दिखाते हुए पूछा कि वह उसे ऐसे क्यों घूर रहा है। वामीरो ने उसे साफ़ शब्दों में चेताया कि नियमों के अनुसार वह किसी दूसरे गाँव के युवक से बात करने या उसके सवालों के जवाब देने के लिए बिलकुल भी मजबूर नहीं है।
गद्यांश 7: तताँरा मानो सुध बुध खोए हुए था। जवाब देने के स्थान पर उसने पुनः अपना प्रश्न दोहराया। “तुमने गाना क्यों रोक दिया? गाओ, गीत पूरा करो। सचमुच तुमने बहुत सुरीला कण्ठ पाया है। ” यह तो मेरे प्रश्न का उत्तर ना हुआ?” युवती ने कहा। “सच बताओ तुम कौन हो?लपाती गाँव में तुम्हें कभी देखा नहीं। ” तताँरा मानो सम्मोहित था। उसके कानों में युवती की आवाज़ ठीक से पहुँच न सकी। उसने पुनः विनय की ,”तुमने गाना क्यों रोक दिया ? गाओ न ?”
  • कठिन शब्दार्थ: सम्मोहित - जादू किया हुआ/मुग्ध, सुरीला कण्ठ - मीठी आवाज़, विनय - प्रार्थना/निवेदन।
  • व्याख्या: तताँरा की हालत इस समय ऐसी थी जैसे किसी ने उस पर कोई गहरा जादू कर दिया हो; उसे वामीरो की चेतावनी और उसके द्वारा पूछे गए सवाल बिलकुल सुनाई ही नहीं दे रहे थे। वह वामीरो के बेरुखेपन को नजरअंदाज करते हुए केवल एक ही धुन में अटका हुआ था कि वह अपने अधूरे गीत को पूरा करे। तताँरा ने वामीरो की आवाज़ की बहुत तारीफ की। जब वामीरो ने दोबारा टोकते हुए कहा कि उसने यह नहीं बताया कि वह कौन है और वह लपाती गाँव का तो बिलकुल नहीं लगता, तब भी तताँरा पर कोई असर नहीं हुआ। तताँरा तो वामीरो की सुंदरता और उसकी आवाज़ में ऐसा खो चुका था कि उसने वामीरो के सवालों का जवाब देने के बजाय एक बार फिर से बहुत ही प्रार्थना भरे स्वर में उसे अपना गीत जारी रखने के लिए कहा।
गद्यांश 8: युवती झुँझला उठी। वह कुछ और सोचने लगी। अंततः उसने निश्चयपूर्वक एक बार पुनः लगभग विरोध करते हुए कड़े शब्दों में कहा। “ढीठता की हद है। मैं जब से परिचय पूछ रही हूँ और तुम बस एक ही राग अलाप रहे हो। गीत गाओ – गीत गाओ ,आखिर क्यों ? क्या तुम्हें गाँव का नियम नहीं मालूम ?” इतना बोलकर वह जाने के लिए तेज़ी से मुड़ी। तताँरा को मानो कुछ होश आया। उसे अपनी गलती का अहसास हुआ। वह उसके सामने रास्ता रोक कर ,मानो गिड़गिड़ाने लगा। “मुझे माफ़ कर दो। जीवन में पहली बार मैं इस तरह विचलित हुआ हूँ। तुम्हें देख कर मेरी चेतना लुप्त हो गई थी। मैं तुम्हारा रास्ता छोड़ दूँगा। बस अपना नाम बता दो। ” तताँरा ने विवशता में आग्रह किया। उसकी आँखे युवती के चेहरे पर केंद्रित थीं। उसके चहरे पर सच्ची विनय थी।
  • कठिन शब्दार्थ: झुँझला - चिढ़ जाना, ढीठता - बदतमीजी/जिद्द, विचलित - अस्थिर या भटक जाना, चेतना - होश, लुप्त - गायब।
  • व्याख्या: तताँरा के अजीब व्यवहार और बार-बार एक ही बात रटने के कारण वामीरो को बहुत चिढ़ होने लगी। उसने गुस्से से तताँरा को फटकारते हुए कहा कि वह हद दर्जे का ढीठ है, जो उसके बार-बार मना करने और नियम याद दिलाने पर भी अपना ही बेतुका राग अलाप रहा है। इतना कहकर वामीरो ने वहाँ से जाने के लिए जैसे ही अपने कदम घुमाए, तताँरा अचानक अपनी खुमारी से बाहर आ गया। उसे तुरंत अपनी गलती समझ में आ गई और उसने एक अपराधी की तरह वामीरो का रास्ता रोककर उससे गिड़गिड़ाते हुए माफ़ी माँगी। तताँरा ने सफाई देते हुए कहा कि आज तक उसके जीवन में कभी ऐसा नहीं हुआ कि वह किसी को देखकर अपना दिमागी संतुलन या होश खो बैठा हो। तताँरा ने लाचारी और पूरी सच्चाई के साथ वामीरो के चेहरे की ओर देखते हुए कहा कि अगर वह सिर्फ अपना नाम बता दे, तो वह उसे जाने देगा।
गद्यांश 9: “वा…. मी….. रो…..” एक रस घोलती आवाज उसके कानों में पहुंची। “वामीरो…. वा…. मी…. रो…. वाह कितना सुंदर नाम है। कल भी आओगी न यहाँ ?तताँरा ने याचना भरे स्वर में कहा। “नहीं…. शायद…… कभी नहीं।” वामीरो ने अन्यमनस्कतापूर्वक कहा और झटके से लपाती की तरफ़ बेसुध सी दौड़ पड़ी। पीछे तताँरा के वाक्य गूँज रहे थे। “वामीरो… मेरा नाम तताँरा है। कल मैं इसी चटान पर प्रतीक्षा करूँगा…..तुम्हारी बाट जोहूंगा…… जरूर आना…” वामीरो रुकी नहीं ,भागती ही गई। तताँरा उसे जाते हुए निहारता रहा।
  • कठिन शब्दार्थ: याचना - मिन्नत या प्रार्थना, अन्यमनस्कतापूर्वक - बिना सोचे-समझे या अनमने ढंग से, बाट जोहना - इंतजार करना, निहारना - लगातार देखना।
  • व्याख्या: तताँरा के इतने आग्रह के बाद युवती ने अपना नाम "वामीरो" बताया। यह नाम तताँरा के कानों में शहद की तरह घुल गया और वह मुग्ध होकर उस नाम को दोहराने लगा। उसने वामीरो से प्रार्थना करते हुए पूछा कि क्या वह अगले दिन भी उसी जगह आएगी। वामीरो ने बिना कुछ सोचे-समझे, जल्दी से 'शायद कभी नहीं' कहा और बिना पलटे अपने गाँव लपाती की ओर तेजी से दौड़ गई। भागती हुई वामीरो के पीछे तताँरा जोर से चिल्लाया कि उसका नाम तताँरा है और वह कल उसी चट्टान पर उसका बेसब्री से इंतजार करेगा। वामीरो ने उसकी बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और बस भागती रही, जबकि तताँरा वहीं खड़ा उसे तब तक एकटक देखता रहा जब तक वह उसकी आँखों से ओझल नहीं हो गई।
गद्यांश 10: वामीरो घर पहुँच कर भीतर ही भीतर कुछ बैचेनी महसूस करने लगी। उसके भीतर तताँरा से मुक्त होने की एक झूठी झटपटाहट थी। एक झल्लाहट में उसने दरवाजा बंद किया और मन को किसी और दिशा में ले जाने का प्रयास किया। बार -बार तताँरा का याचना भरा चेहरा उसकी आँखों में तैर जाता। उसने तताँरा के बारे में कई कहानियां सुन रखी थी। उसकी कल्पना में वह एक अद्भुत साहसी युवक था। किन्तु वही तताँरा उसके सम्मुख एक अलग रूप में आया। सुंदर ,बलिष्ठ किन्तु बेहद शांत ,सभ्य और भोला। उसका व्यक्तित्व कदाचित वैसा ही था जैसा वह अपने जीवन साथी के बारे में सोचती रही थी। किन्तु एक दूसरे गाँव के युवक के साथ यह सम्बन्ध परम्परा के विरुद्ध था। अतएव उसने उसे भूल जाना ही श्रेयस्कर समझा। किन्तु यह असंभव जान पड़ा। तताँरा बार -बार उसकी आँखों के सामने था। निर्निमेष याचक की तरह प्रतीक्षा में डूबा हुआ।
  • कठिन शब्दार्थ: सम्मुख - सामने, बलिष्ठ - शक्तिशाली/ताकतवर, श्रेयस्कर - भलाई या कल्याणकारी, निर्निमेष - बिना पलक झपकाए (एकटक)।
  • व्याख्या: घर लौटने के बाद वामीरो का मन बहुत अशांत हो गया था। वह खुद को यह दिलासा देने की कोशिश कर रही थी कि उसे तताँरा से पीछा छुड़ाकर खुशी हुई, लेकिन यह पूरी तरह झूठ था। वामीरो ने अपने मन को भटकाने की बहुत कोशिश की, लेकिन तताँरा का वह भोला और प्रार्थना करता हुआ चेहरा बार-बार उसकी आँखों के सामने आ रहा था। उसने बचपन से ही तताँरा की शक्ति और बहादुरी के किस्से सुने थे, लेकिन आज जब वह उससे मिली, तो उसने पाया कि तताँरा ताकतवर होने के साथ-साथ बहुत ही शांत, सभ्य और सुंदर भी है। वामीरो को लगा कि तताँरा बिलकुल वैसा ही इंसान है जैसा वह अपने भविष्य के पति के रूप में चाहती थी। लेकिन गाँव के कड़े नियमों और परंपराओं को याद करके उसने यह तय किया कि उसकी भलाई तताँरा को भूल जाने में ही है। इसके बावजूद, वामीरो के लिए उसे भूलना नामुमकिन हो रहा था क्योंकि तताँरा की छवि लगातार उसके मन पर हावी हो रही थी।
गद्यांश 11: किसी तरह रात बीती। दोनों के ह्रदय व्यथित थे। किसी तरह आँचरहित एक ठंडा और ऊबाऊ दिन गुजरने लगा। शाम की प्रतीक्षा थी। तताँरा के लिए मानो पुरे जीवन की अकेली प्रतीक्षा थी। उसके गंभीर और शांत जीवन में ऐसा पहली बार हुआ था। वह अचंभित था ,साथ ही रोमांचित भी। दिन ढलने के काफ़ी पहले वह लपाती की उस समुद्री चट्टान पर पहुँच गया। वामीरो की प्रतीक्षा में एक -एक पल पहाड़ की तरह भारी था। उसके भीतर एक आशंका भी दौड़ रही थी। अगर वामीरो न आई तो ?वह कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था। सिर्फ़ प्रतीक्षारत था। बस आस की एक किरण थी जो समुद्र की देह पर डूबती किरणों की तरह कभी भी डूब सकती थी।
  • कठिन शब्दार्थ: व्यथित - दुखी/बेचैन, आँचरहित - जिसमें कोई उत्साह या गर्मी न हो, अचंभित - हैरान, आशंका - संदेह या डर।
  • व्याख्या: तताँरा और वामीरो, दोनों के लिए वह रात काटना बहुत भारी पड़ रहा था क्योंकि दोनों के दिल में एक अजीब सी बेचैनी थी। अगला पूरा दिन दोनों के लिए बहुत ही उबाऊ और नीरस साबित हुआ, क्योंकि दोनों की नज़रें सिर्फ शाम होने का इंतजार कर रही थीं। तताँरा के हमेशा से शांत रहने वाले जीवन में यह पहली बार था जब वह किसी से मिलने के लिए इतना तड़प रहा था। वह अपने अंदर उठ रहे इस नए एहसास से हैरान भी था और खुश भी। अपनी बेताबी के कारण तताँरा शाम होने से बहुत पहले ही लपाती गाँव की उस चट्टान पर पहुँच गया। वहाँ इंतज़ार करते हुए उसे एक-एक पल सदियों जैसा लग रहा था। उसके मन में यह डर भी सता रहा था कि अगर वामीरो ने अपना इरादा बदल दिया और वह नहीं आई, तो वह क्या करेगा; क्योंकि उसके पास इस उम्मीद की किरण के अलावा और कोई सहारा नहीं था।
गद्यांश 12: वह बार -बार लपाती के रास्ते पर नजर दौड़ाता। सहसा नारियल के झुरमुटों में उसे एक आकृति कुछ साफ़ हुई….. कुछ और…. कुछ और। उसकी ख़ुशी का ठिकाना न रहा। सचमुच वह वामीरो थी। लगा जैसे वह घबराहट में थी। वह अपने को छुपाते हुए बढ़ रही थी। बीच -बीच में इधर उधर दृष्टि दौड़ाना नहीं भूलती। फिर तेज़ क़दमों से चलती हुई तताँरा के सामने आकर ठिठक गई। दोनों शब्दहीन थे। कुछ था जो दोनों के भीतर बह रहा था। एकटक निहारते हुए वे जाने कब तक खड़े रहे। सूरज समुद्र लहरों में कहीं खो गया था। अँधेरा बढ़ रहा था। अचानक वामीरो कुछ सचेत हुई और घर की तरफ दौड़ पड़ी। तताँरा अभी भी वहीँ खड़ा था…… निश्चल….. शब्दहीन…..।
  • कठिन शब्दार्थ: सहसा - अचानक, झुरमुटों - पेड़ों का झुंड, सचेत - होश में आना, निश्चल - स्थिर या जो हिले-डुले नहीं।
  • व्याख्या: तताँरा की आँखें लपाती गाँव से आने वाले रास्ते पर टिकी हुई थीं। अचानक उसे नारियल के पेड़ों के बीच से एक परछाई अपनी ओर आती दिखाई दी, जो पास आने पर स्पष्ट हो गई कि वह वामीरो ही है। वामीरो को देखते ही तताँरा की खुशी की कोई सीमा नहीं रही। वामीरो बहुत डरी हुई लग रही थी और वह छुपते-छुपाते आ रही थी ताकि गाँव का कोई व्यक्ति उसे देख न ले। वह तताँरा के पास आकर रुक गई, लेकिन दोनों के मुँह से एक भी शब्द नहीं निकला। उनके बीच खामोशी थी, पर उनके दिल एक-दूसरे के प्यार को महसूस कर रहे थे। वे बिना कुछ बोले काफी देर तक बस एक-दूसरे की आँखों में देखते रहे। जब सूरज पूरी तरह ढल गया और अँधेरा छाने लगा, तब वामीरो को अचानक होश आया और वह तुरंत अपने घर की ओर भाग गई। जबकि तताँरा एक मूर्ति की तरह उसी स्थान पर चुपचाप खड़ा रहा।
गद्यांश 13: दोनों रोज उसी जगह पहुँचते और मूर्तिवत एक दूसरे को निर्निमेष ताकते रहते। बस भीतर समर्पण था जो अनवरत गहरा रहा था। लपाती के कुछ युवकों ने इस मूक प्रेम को भाँप लिया और खबर हवा की तरह बह उठी। वामीरो लपाती ग्राम की थी और तताँरा पासा का। दोनों का सम्बन्ध संभव न था। रीति के अनुसार दोनों को एक ही गाँव का होना आवश्यक था। वामीरो और तताँरा को समझाने-बुझाने के कई प्रयास हुए किन्तु दोनों अडिग रहे। वे नियमतः लपाती के उसी समुद्री किनारे पर मिलते रहे। अफ़वाहें फैलती रहीं।
  • कठिन शब्दार्थ: मूर्तिवत - पुतले/मूर्ति के समान, अनवरत - लगातार/बिना रुके, अडिग - जो अपनी जगह या बात से न हिले।
  • व्याख्या: अब तताँरा और वामीरो के लिए हर शाम उसी चट्टान पर मिलना एक नियम बन गया था। वे बिना कुछ कहे बस एक-दूसरे को देखते रहते थे, लेकिन उनके दिलों में एक-दूसरे के प्रति प्रेम और समर्पण की भावना लगातार मजबूत होती जा रही थी। जल्द ही लपाती गाँव के कुछ लोगों को उनके इस छुप-छुप कर मिलने का पता चल गया और यह बात पूरे द्वीप पर आग की तरह फैल गई। समस्या यह थी कि वामीरो लपाती गाँव की थी और तताँरा पासा गाँव का; और सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार अलग-अलग गाँव के लोगों का आपस में शादी करना सख्त मना था। दोनों के परिवारों और गाँव वालों ने उन्हें बहुत समझाया और डराया, लेकिन उनका प्यार इतना सच्चा था कि वे किसी के सामने नहीं झुके। वे लोगों की बातों की परवाह किए बिना हर शाम समुद्र के किनारे मिलते रहे, जिससे पूरे गाँव में तनाव बढ़ता गया।
गद्यांश 14: कुछ समय बाद पासा गाँव में ‘पशु पर्व ‘का आयोजन हुआ। पशु पर्व में हष्ट पुष्ट पशुओं के प्रदर्शन के अतिरिक्त पशुओं से युवकों की शक्ति परीक्षा प्रतियोगिता भी होती है। वर्ष में एक बार सभी गाँव के लोग हिस्सा लेते हैं। बाद में नृत्य -संगीत और भोजन का भी आयोजन होता है। शाम को सभी लोग पासा में एकत्रित होने लगे। धीरे -धीरे विभिन्न कार्यक्रम शुरू हुए। तताँरा का मन इन कार्यक्रमों में तनिक न था। उसकी व्याकुल आँखे वामीरों को ढूंढने में व्यस्त थीं। नारियल के झुण्ड के एक पेड़ के पीछे से उसे जैसे कोई झांकता दिखा। उसने थोड़ा और करीब जा कर पहचानने की चेष्टा की। वह वामीरो थी जो भयवश सामने आने से झिझक रही थी।
  • कठिन शब्दार्थ: हष्ट पुष्ट - ताकतवर/स्वस्थ, व्याकुल - बेचैन या परेशान, चेष्टा - कोशिश।
  • व्याख्या: कुछ दिनों बाद पासा गाँव में सालाना 'पशु पर्व' का भव्य आयोजन हुआ। यह एक ऐसा त्योहार था जिसमें बलिष्ठ जानवरों की प्रदर्शनी लगाई जाती थी और गाँव के नौजवान जानवरों के साथ अपनी ताकत का प्रदर्शन करते थे। इस मेले में द्वीप के सभी गाँवों के लोग शामिल होते थे और प्रतियोगिताओं के बाद नाच-गाना और दावत होती थी। शाम के समय जब मेले में भीड़ जुटने लगी और कार्यक्रम शुरू हुए, तब तताँरा का मन किसी भी खेल या आयोजन में नहीं लग रहा था। उसका बेचैन मन सिर्फ भीड़ में वामीरो को खोजने का प्रयास कर रहा था। तभी उसकी नज़र नारियल के पेड़ों के पीछे छिपी एक परछाई पर पड़ी। पास जाकर तताँरा ने देखा कि वह वामीरो ही थी, जो गाँव वालों के डर के मारे खुलेआम सामने आने से कतरा रही थी।
गद्यांश 15: उसकी आँखे तरल थी। होंठ काँप रहे थे। तताँरा को देखते ही वह फुटकर रोने लगी। तताँरा विह्वल गया। उससे कुछ बोलते ही नहीं बन रहा था। रोने की आवाज लगातार ऊँची होती जा रही थी। तताँरा किंकर्तव्यविमूढ़ था। वामीरो के रुदन स्वरों को सुन कर उसकी माँ वहाँ पहुँची और दोनों को देखकर आग बबूला हो उठी। सारे गाँव वालों की उपस्थिति में यह दृश्य उसे अपमान जनक लगा। इस बीच गाँव के कुछ लोग भी वहाँ पहुँच गए। वामीरो की माँ क्रोध में उफन उठी। उसने तताँरा को तरह -तरह से अपमानित किया। गाँव के लोग भी तताँरा के विरोध में आवाजें उठाने लगे।
  • कठिन शब्दार्थ: विह्वल - भावुक या परेशान, किंकर्तव्यविमूढ़ - ऐसी स्थिति जिसमें कुछ समझ न आए कि क्या करें, रुदन - रोना।
  • व्याख्या: जब तताँरा ने वामीरो को देखा तो उसकी आँखों में आँसू भरे थे और डर के कारण उसके होंठ काँप रहे थे। तताँरा को अपने सामने पाते ही वामीरो अपने आँसू रोक नहीं पाई और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। वामीरो को इस कदर तड़पता देखकर तताँरा पूरी तरह सुन्न पड़ गया; उसे कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह उसे कैसे चुप कराए। वामीरो के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ सुनकर उसकी माँ वहाँ आ गई और उन दोनों को इस तरह अकेले मिलते देखकर गुस्से से पागल हो गई। वामीरो की माँ को लगा कि पूरे गाँव के सामने उसकी बेटी ने उसकी नाक कटवा दी है। भीड़ इकट्ठी होते देख वामीरो की माँ ने अपना आपा खो दिया और उसने तताँरा को बहुत बुरा-भला कहना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे गाँव के अन्य लोग भी तताँरा के खिलाफ हो गए और उसे ताने मारने लगे।
गद्यांश 16: यह तताँरा के लिए असहनीय था। वामीरो अब भी रोए जा रही थी। तताँरा भी गुस्से से भर उठा। उसे जहाँ विवाह की निषेध परम्परा पर क्षोभ था वहीँ अपनी असहायता पर खीझ। वामीरो का दुःख उसे और गहरा कर रहा था। उसे मालूम न था कि क्या कदम उठाना चाहिए ?अनायास उसका हाथ तलवार की मूठ पर जा टिका। क्रोध में उसने तलवार निकली और कुछ विचार करता रहा। क्रोध लगातार अग्नि की तरह बढ़ रहा था। लोग सहम उठे। एक सन्नाटा सा खींच गया। जब कोई राह न सूझी तो क्रोध का शमन करने के लिए उसने शक्ति भर उसे धरती में घोंप दिया और ताकत से उसे खींचने लगा। वह पसीने से नहा उठा। सब घबराए हुए थे।
  • कठिन शब्दार्थ: असहनीय - जो बर्दाश्त न किया जा सके, क्षोभ - भारी गुस्सा/विरोध, खीझ - चिढ़, अनायास - अचानक/बिना सोचे, शमन - शांत करना।
  • व्याख्या: तताँरा के लिए भरे मेले में यह अपमान और वामीरो का लगातार रोना बर्दाश्त के बाहर हो चुका था। तताँरा के अंदर अब भयंकर गुस्सा उबलने लगा था। एक तरफ उसे गाँव के उन बेतुके नियमों पर गुस्सा आ रहा था जो दो प्यार करने वालों को रोक रहे थे, तो दूसरी तरफ उसे अपनी लाचारी पर चिढ़ हो रही थी। गुस्से में तताँरा का हाथ खुद-ब-खुद उसकी लकड़ी की तलवार पर चला गया। उसने म्यान से तलवार निकाली, जिससे भीड़ में सन्नाटा और खौफ छा गया। तताँरा को समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने इस असीम क्रोध को किस पर उतारे। अंततः अपने गुस्से को शांत करने के लिए उसने पूरी ताकत लगाकर अपनी तलवार को ज़मीन के भीतर गाड़ दिया और उसे अपनी ओर ज़ोर से खींचने लगा। इस भयंकर प्रयास में तताँरा पसीने से लथपथ हो गया और आस-पास खड़े लोग किसी अनहोनी के डर से काँपने लगे।
गद्यांश 17: वह तलवार को अपनी तरफ खींचते -खींचते दूर तक पहुँच गया। वह हाँफ रहा था। अचानक जहाँ तक लकीर खिंच गई थी ,वहाँ एक दरार होने लगी। मानो धरती दो टुकड़ों में बांटने वाली हो। एक गड़गड़ाहट -सी गूँजने लगी और लकीर की सीध में धरती फटती ही जा रही थी। द्वीप के अंतिम सिरे तक तताँरा धरती को मानो क्रोध में काटता जा रहा था। सभी भयाकुल हो उठे। लोगों ने ऐसे दृश्य की कल्पना न की थी ,वे सिहर उठे। उधर वामीरो फटती हुई धरती के किनारे चीखती हुई दौड़ रही थी -तताँरा……तताँरा…..तताँरा उसकी करुण चीख मानो गड़गड़ाहट में डूब गई।
  • कठिन शब्दार्थ: भयाकुल - बहुत अधिक डरे हुए, सिहर - काँप जाना, करुण - दर्द या दया से भरी।
  • व्याख्या: तताँरा तलवार को ज़मीन में गड़ाए हुए उसे अपनी ओर खींचते-खींचते द्वीप के काफी अंदर तक चला गया था। उसकी ताक़त और क्रोध का परिणाम यह हुआ कि जहाँ-जहाँ से तलवार गुज़री, वहाँ की ज़मीन फटने लगी और गहरी दरार बन गई। पूरे वातावरण में भूकंप जैसी एक भयानक गड़गड़ाहट होने लगी और देखते ही देखते धरती बीच से दो हिस्सों में फटने लगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे तताँरा अपने गुस्से से पूरे द्वीप को दो टुकड़ों में काट देना चाहता हो। इस महाविनाशकारी दृश्य को देखकर वहाँ मौजूद सभी लोग डर के मारे थर-थर काँपने लगे। इस बीच वामीरो भी तताँरा को बचाने के लिए उस फटती हुई दरार के किनारे-किनारे दौड़ती हुई उसे पुकारने लगी। लेकिन वामीरो की वह दर्दभरी आवाज़ धरती के फटने के भयानक शोर में कहीं खो कर रह गई।
गद्यांश 18: तताँरा दुर्भाग्यवंश दूसरी तरफ था। द्वीप के अंतिम सिरे तक धरती को चीरता वह जैसे ही अंतिम छोर तक पहुँचा ,द्वीप दो टुकड़ों में विभक्त हो चूका था। एक तरफ तताँरा था दूसरी तरफ वामीरो। तताँरा को जैसे ही होश आया ,उसने देखा उसकी तरफ का द्वीप समुद्र में धँसने लगा है। वह छटपटाने लगा उसने छलांग लगा कर दूसरा सिरा थामना चाहा किन्तु पकड़ ढीली पड़ गई। वह निचे की तरफ फिसलने लगा। वह लगातार समुद्र की सतह की तरफ फिसल रहा था। उसके मुँह से सिर्फ एक ही चीख उभर कर डूब रही थी ,वामीरो……. वामीरो……. वामीरो……. वामीरो……. ” उधर वामीरो भी “तताँरा तताँरा ता…. ताँ…. रा …. ” पुकार रही थी।
  • कठिन शब्दार्थ: दुर्भाग्यवंश - बुरी किस्मत से, विभक्त - बँट जाना, छटपटाने - तड़पना/बेचैन होना।
  • व्याख्या: किस्मत का सबसे क्रूर खेल यह था कि जब धरती फटी, तो तताँरा और वामीरो दोनों अलग-अलग हिस्सों पर रह गए। जब तताँरा द्वीप के दूसरे छोर तक पहुँचा, तब तक वह विशाल द्वीप पूरी तरह से दो अलग-अलग हिस्सों में टूट चुका था। जब तताँरा का गुस्सा कुछ कम हुआ, तो उसने महसूस किया कि वह जिस हिस्से पर खड़ा है, वह तेज़ी से समुद्र के गहरे पानी में डूब रहा है। बचने की तड़प में तताँरा ने द्वीप के दूसरे सुरक्षित हिस्से की ओर छलाँग लगाई, लेकिन उसकी पकड़ कमज़ोर पड़ गई। वह धीरे-धीरे समुद्र की लहरों की ओर खिसकने लगा। उस दर्दनाक पल में उसके होंठों पर सिर्फ वामीरो का नाम था। दूसरी ओर खड़ी बेबस वामीरो भी रोते हुए लगातार तताँरा को पुकार रही थी, लेकिन दोनों एक-दूसरे की मदद करने में पूरी तरह असमर्थ थे।
गद्यांश 19: तताँरा लहूलुहान हो चूका था… वह अचेत होने लगा और कुछ देर बाद उसे कोई होश नहीं रहा। वह कटे हुए द्वीप के अंतिम भूखंड पर पड़ा हुआ था जो की दूसरे हिस्से से संयोगवंश जुड़ा था। बहता हुआ तताँरा कहाँ पहुँचा,बाद में उसका क्या हुआ कोई नहीं जानता। इधर वामीरो पागल हो उठी। वह हर समय तताँरा को खोजती हुई उसी जगह पहुँचती और घण्टों बैठी रहती। उसने खाना पीना छोड़ दिया। परिवार से वह एक तरह विलग हो गई। लोगो ने उसे ढूंढने की बहुत कोशिश की किन्तु कोई सुराग नहीं मिला।
  • कठिन शब्दार्थ: अचेत - बेहोश होना, भूखंड - ज़मीन का टुकड़ा, विलग - अलग हो जाना/टूट जाना।
  • व्याख्या: अपनी जान बचाने की जद्दोजहद में तताँरा पूरी तरह से घायल और खून से लथपथ हो गया था। दर्द और थकान के कारण वह अपनी सुध-बुध खोकर बेहोश हो गया। वह उस टूटे हुए द्वीप के एक छोटे से हिस्से पर पड़ा हुआ था। इसके बाद वह पानी में बहकर कहाँ गया और उसका क्या हश्र हुआ, यह रहस्य आज तक कोई नहीं जान पाया। दूसरी तरफ, अपने प्यार को आँखों के सामने इस तरह खोने के बाद वामीरो का मानसिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया। वह पागलों की तरह हर रोज़ उसी चट्टान पर जाकर बैठ जाती जहाँ वह तताँरा से मिला करती थी। उसने खाना-पीना और अपने परिवार से बातचीत करना सब बंद कर दिया। एक दिन वह भी अचानक कहीं गायब हो गई और लाख कोशिशों के बाद भी गाँव वालों को उसका कोई नामो-निशान नहीं मिला।
गद्यांश 20: आज न तताँरा है और न वामीरो किन्तु उनकी यह प्रेमकथा घर -घर में सुनाई जाता है। निकोबारियों का मत है कि तताँरा की तलवार से कार -निकोबार के जो टुकड़े हुए ,उसमें दूसरा लिटिल अंदमान है जो कार निकोबार से आज 96 कि.मी. दूर स्थित है। निकोबारी इस घटना के बाद दूसरे गाँवों में भी आपसी वैवाहिक सम्बन्ध करने लगे। तताँरा- वामीरो की त्यागमयी मृत्यु शायद इसी सुखद परिवर्तन के लिए थी।
  • कठिन शब्दार्थ: त्यागमयी - बलिदान से भरी, सुखद - खुशी देने वाला।
  • व्याख्या: आज तताँरा और वामीरो इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके असीम प्यार और बलिदान की कहानी आज भी अंडमान-निकोबार के हर घर में जीवित है। निकोबार के निवासियों का यह दृढ़ विश्वास है कि तताँरा की लकड़ी की तलवार से धरती चीरने के कारण ही वह द्वीप दो हिस्सों में बँटा था। आज जो हिस्सा 'लिटिल अंडमान' कहलाता है, वह कार-निकोबार से 96 किलोमीटर दूर है। इस खौफनाक और दुखद घटना ने समाज की आँखें खोल दीं। निकोबार के लोगों को अपनी रूढ़िवादी परंपरा की गलती का एहसास हुआ और उन्होंने एक ही गाँव में विवाह करने का नियम हमेशा के लिए खत्म कर दिया। इस प्रकार, तताँरा और वामीरो के महान बलिदान ने आने वाली पीढ़ियों के लिए समाज में एक बहुत ही सकारात्मक और खुशी भरा बदलाव ला दिया।
5. पाठ में प्रयुक्त मुहावरे, अर्थ और वाक्य प्रयोग
यहाँ पाठ से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुहावरे और उनके अर्थ दिए गए हैं:
  1. सुध-बुध खोना (होश-हवास न रहना / अपने आप में न रहना)
    • वाक्य प्रयोग: वामीरो का मधुर गीत सुनकर तताँरा अपनी सुध-बुध खो बैठा था।
  2. एक ही राग अलापना (एक ही बात को बार-बार दोहराना)
    • वाक्य प्रयोग: वामीरो बार-बार तताँरा से उसका परिचय पूछ रही थी, लेकिन तताँरा गीत पूरा करने का एक ही राग अलाप रहा था।
  3. हवा की तरह बहना / फैलना (किसी बात या खबर का बहुत तेज़ी से फैलना)
    • वाक्य प्रयोग: तताँरा और वामीरो के प्रेम की खबर लपाती और पासा गाँव में हवा की तरह फैल गई।
  4. आग-बबूला होना (अत्यधिक क्रोधित होना)
    • वाक्य प्रयोग: पशु-पर्व में वामीरो को तताँरा के सामने रोता देख उसकी माँ आग-बबूला हो उठी।
  5. पसीने से नहाना (बहुत अधिक मेहनत करना या घबराहट होना)
    • वाक्य प्रयोग: अपनी जादुई तलवार से धरती को चीरने के प्रयास में तताँरा पसीने से नहा उठा।
  6. खुशी का ठिकाना न रहना (बहुत अधिक प्रसन्न होना)
    • वाक्य प्रयोग: लपाती की चट्टान पर वामीरो को अपनी ओर आता देख तताँरा की खुशी का ठिकाना न रहा।
6. पाठ का संदेश एवं सीख
"तताँरा-वामीरो कथा" हमें मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण संदेश देती है:
  • प्रेम सबसे बड़ी शक्ति है: यह कहानी बताती है कि सच्चा प्रेम लोगों को जोड़ता है और किसी भी भेदभाव को नहीं मानता
  • रूढ़िवादी परंपराओं का विरोध: समाज में फैली वे पुरानी और कठोर परंपराएँ, जो लोगों की खुशियाँ छीन लेती हैं और उन्हें बाँटती हैं, समय के साथ बदल दी जानी चाहिए। समाज में एक सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अक्सर साहस और किसी न किसी के बड़े त्याग की आवश्यकता होती है। तताँरा और वामीरो के बलिदान ने अंततः उनके समाज को अंधविश्वास और गलत नियमों के जाल से मुक्त कर दिया