हरिद्वार (यात्रा-वृत्तांत)

भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रसिद्ध रचना — हरिद्वार का आध्यात्मिक और प्राकृतिक सौंदर्य

लेखक: भारतेंदु हरिश्चंद्र | विधा: यात्रा-वृत्तांत
Quick Summary: "हरिद्वार" पाठ भारतेंदु हरिश्चंद्र जी द्वारा रचित एक सजीव यात्रा-वृत्तांत है, जिसे उन्होंने 1871 में 'कविवचन सुधा' पत्रिका के संपादक को एक पत्र के रूप में लिखा था। इस पाठ में उन्होंने पवित्र गंगा, हरे-भरे पहाड़ों, साधु-संन्यासियों की तपस्या, और वहाँ की अलौकिक शांति का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया है। लेखक का मानना है कि हरिद्वार पहुँचते ही मनुष्य का मन निर्मल हो जाता है और ज्ञान, वैराग्य व भक्ति का संचार होने लगता है।

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✍️ लेखक परिचय

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इस पाठ के रचयिता प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं। उन्होंने अपनी हरिद्वार यात्रा के अनमोल संस्मरणों को एक पत्र के रूप में संकलित किया था, जिसे उन्होंने 'कविवचन सुधा' नामक पत्रिका के संपादक को प्रेषित किया था। उनके लेखन में प्रकृति प्रेम, आध्यात्मिकता और भारतीय संस्कृति की गहरी समझ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है。

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📘 पाठ परिचय

"हरिद्वार" पाठ मूलतः एक यात्रा-वृत्तांत है जिसमें लेखक ने सन् 1871 में की गई अपनी हरिद्वार यात्रा का सजीव चित्रण किया है। यह पाठ केवल एक यात्रा का विवरण नहीं है, बल्कि यह पवित्र गंगा नदी, वहाँ के शांत वातावरण, ऊँचे पर्वतों और धार्मिक स्थलों के दर्शन कराता है। इस पाठ के माध्यम से हमें प्रकृति की सुंदरता और भक्तिपूर्ण शांति की एक अद्भुत झलक मिलती है。

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📚 विस्तृत सारांश

यह पाठ हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखी गई एक भावपूर्ण यात्रा-कथा है। इसमें उन्होंने अपने हरिद्वार प्रवास के दौरान प्राप्त अनुभवों, वहाँ के प्राकृतिक वातावरण और धार्मिक महत्व का अत्यंत संवेदनशील वर्णन किया है। लेखक के लिए यह यात्रा केवल तीर्थ-दर्शन तक सीमित नहीं थी, बल्कि मन और आत्मा को शांति देने वाला एक विशेष अनुभव बन गई थी। उन्होंने अपने अनुभवों को पत्र शैली में प्रस्तुत किया, जिससे पाठ और अधिक जीवंत और आत्मीय प्रतीत होता है।

हरिद्वार पहुँचते ही लेखक का मन आनंद और श्रद्धा से भर उठता है। उन्हें ऐसा महसूस होता है मानो इस भूमि में प्रवेश करते ही मनुष्य के भीतर की अशुद्धियाँ स्वतः समाप्त होने लगती हैं। चारों ओर फैले पर्वत, उन पर उगी हरियाली और प्रकृति की सुंदरता लेखक को अत्यंत आकर्षित करती है। वर्षा ऋतु के कारण वातावरण और भी मनमोहक हो गया था। पहाड़ों पर फैले वृक्ष और लताएँ उन्हें ऐसे दिखाई देते हैं जैसे वे वर्षों से ध्यान में लीन साधु हों।

इस पाठ में गंगा नदी का वर्णन विशेष रूप से आकर्षक है। लेखक गंगा को केवल नदी नहीं, बल्कि पवित्रता और आस्था का प्रतीक मानते हैं। उनके अनुसार गंगा का जल निर्मल, शीतल और मधुर है। उसकी तीव्र धारा और कल-कल की ध्वनि वातावरण को आध्यात्मिक बना देती है। जब शीतल हवा गंगा के जलकणों को साथ लेकर बहती है, तो उसका स्पर्श मन को अलौकिक शांति प्रदान करता है। लेखक ने नीलधारा और मुख्य गंगा धारा का उल्लेख करते हुए वहाँ स्थित चण्डिका देवी मंदिर की सुंदरता का भी वर्णन किया है।

हरिद्वार का सबसे प्रसिद्ध स्थान “हरि की पैड़ी” लेखक को अत्यंत प्रभावित करता है। यहाँ श्रद्धालु बड़ी आस्था के साथ स्नान करते हैं और गंगा माता की पूजा करते हैं। लेखक को यह देखकर आश्चर्य होता है कि वहाँ लोगों की श्रद्धा का केंद्र मुख्य रूप से गंगा ही हैं। साधु-संतों के आश्रम और मंदिर होने के बावजूद वहाँ किसी प्रकार का दिखावा या कृत्रिमता दिखाई नहीं देती।

लेखक के अनुसार हरिद्वार का वातावरण इतना शांत और पवित्र है कि वहाँ मनुष्य के भीतर के बुरे विचार स्वतः कम होने लगते हैं। वहाँ के लोग सरल, संतोषी और विनम्र स्वभाव के हैं। पंडे और दुकानदार थोड़े से दान में भी प्रसन्न हो जाते हैं। लेखक ने हरिद्वार के प्रमुख तीर्थ स्थलों—हरिद्वार, कुशावर्त, नीलधारा, विल्व पर्वत और कनखल—का भी उल्लेख किया है। कनखल का धार्मिक महत्व बताते हुए उन्होंने राजा दक्ष के यज्ञ और सती के आत्मत्याग की कथा का संकेत दिया है।

यात्रा के दौरान लेखक ने शांत वातावरण में निवास किया और गंगा तट पर बिताए क्षणों का भरपूर आनंद लिया। ग्रहण के अवसर पर गंगा स्नान और धार्मिक पाठ से उन्हें गहरा आत्मिक सुख प्राप्त हुआ। उनके साथ उनके मित्र भी इस यात्रा में सम्मिलित थे, जिससे यात्रा और अधिक आनंदमयी बन गई।

लेखक को सबसे अधिक आनंद उस समय मिला जब उन्होंने गंगा किनारे स्वयं भोजन तैयार कर खुले वातावरण में बैठकर भोजन किया। वह साधारण भोजन भी उन्हें किसी बड़े राजसी भोज से अधिक सुखद लगा। हरिद्वार का वातावरण उनके मन में भक्ति, वैराग्य और शांति की भावना उत्पन्न करता है। वहाँ का शांत जीवन, प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था उनके हृदय पर गहरा प्रभाव छोड़ती है।

अंत में लेखक स्वीकार करते हैं कि हरिद्वार की स्मृतियाँ उनके मन में हमेशा जीवित रहेंगी। यह यात्रा-वृत्तांत केवल किसी स्थान का वर्णन नहीं करता, बल्कि भारतीय संस्कृति, प्रकृति और आध्यात्मिकता की सुंदर झलक भी प्रस्तुत करता है।


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गद्य खंड, शब्दार्थ एवं व्याख्या

1 गद्य खंड 1
श्रीमान कविवचन सुधा संपादक महामहिम मित्रवरेषु ! मुझे हरिद्वार का समाचार लिखने में बड़ा आनंद होता है कि मैं उस पुण्य भूमि का वर्णन करता हूँ जहाँ प्रवेश करने ही से मन शुद्ध हो जाता है। यह भूमि तीन ओर सुंदर हरे–हरे पर्वतों से घिरी है जिन पर्वतों पर अनेक प्रकार की वल्ली हरी–भरी सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति फैलकर लहलहा रही है और बड़े–बड़े वृक्ष भी ऐसे खड़े हैं मानो एक पैर से खड़े तपस्या करते हैं और साधुओं की भाँति घाम, ओस और वर्षा अपने ऊपर सहते हैं।

📚 कठिन शब्दों के अर्थ

शब्दअर्थ
पुण्य भूमिपवित्र और पावन स्थान
वल्लीपेड़-पौधों की बेलें या लताएँ
मनोरथहृदय की इच्छाएँ या कामनाएँ
तपस्याकठोर साधना या ध्यान
घामसूर्य की तेज़ धूप
प्रस्तुत गद्यांश में भारतेंदु जी 'कविवचन सुधा' के संपादक को पत्र लिखते हुए हरिद्वार की महिमा का बखान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि इस पवित्र भूमि के बारे में लिखते हुए उन्हें असीम खुशी मिल रही है, क्योंकि यह एक ऐसा सिद्ध स्थान है जिसकी सीमा में कदम रखते ही मनुष्य का हृदय सारे विकारों से मुक्त होकर एकदम शुद्ध हो जाता है। यह पूरा क्षेत्र तीन तरफ से अत्यंत खूबसूरत और हरे-भरे पहाड़ों से आच्छादित है। इन पहाड़ों पर लिपटी हुई लताएँ इस तरह से फल-फूल रही हैं, जैसे किसी अच्छे और सज्जन इंसान के मन में उठने वाली नेक इच्छाएँ पल्लवित होती हैं। यहाँ के विशालकाय पेड़ों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे कोई योगी हों, जो एक पैर पर खड़े होकर कठोर तपस्या में लीन हैं और बिना कोई शिकायत किए हर मौसम की कड़ी धूप, सर्दी की ओस और बारिश की मार को शांति से सहन कर रहे हैं।
2 गद्य खंड 2
अहा! इनके जन्म भी धन्य हैं जिनसे अर्थी विमुख जाते ही नहीं। फल, फूल, गंध, छाया, पत्ते, छाल, बीज, लकड़ी और जड़; यहाँ तक कि जले पर भी कोयले और राख से लोगों का मनोर्थ पूर्ण करते हैं। सज्जन ऐसे कि पत्थर मारने से फल देते हैं। इन वृक्षों पर अनेक रंग के पक्षी चहचहाते हैं और नगर के दुष्ट बधिकों से निडर होकर कल्लोल करते हैं। वर्षा के कारण सब ओर हरियाली ही दिखाई पड़ती थी मानो हरे गलीचा की जात्रियों के विश्राम के हेतु बिछायत बिछी थी। एक ओर त्रिभुवन पावनी श्री गंगा जी की पवित्र धारा बहती है जो राजा भगीरथ के उज्ज्वल कीर्ति की लता–सी दिखाई देती है। जल यहाँ का अत्यंत शीतल है और मिष्ट भी वैसा ही है मानो चीनी के पने को बरफ में जमाया है, रंग जल का स्वच्छ और श्वेत है और अनेक प्रकार के जल–जंतु कल्लोल करते हुए।

📚 कठिन शब्दों के अर्थ

शब्दअर्थ
अर्थीचाहने वाले या मृत देह (जो लकड़ी के सहारे जलती है)
विमुखखाली हाथ लौटना या मुँह फेरना
बधिकजानवरों को मारने वाले शिकारी
कल्लोल करनामौज-मस्ती करना या खुशी से चहकना
त्रिभुवन पावनीतीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) को पवित्र करने वाली माता गंगा
मिष्टबहुत अधिक मीठा
पनामीठा शरबत
लेखक यहाँ वृक्षों के परोपकारी स्वभाव पर मुग्ध होकर कहते हैं कि इन पेड़ों का जीवन सचमुच महान और सार्थक है, क्योंकि इनके पास आने वाला कोई भी ज़रूरतमंद कभी खाली हाथ नहीं लौटता। ये पेड़ जीवन भर अपने फल, फूल, पत्ते, छाया और लकड़ी से संसार की सेवा करते हैं, और नष्ट होने के बाद भी उनकी राख और कोयला मनुष्य के काम आते हैं। ये इतने दयालु हैं कि यदि कोई इन्हें पत्थर भी मारता है, तो बदले में ये मीठे फल ही गिराते हैं। इन पेड़ों पर रंग-बिरंगे पक्षी बिना किसी शिकारी के डर के आज़ादी से गाते और खेलते हैं। बारिश की वजह से ज़मीन पर फैली हरी घास ऐसी लग रही थी जैसे तीर्थयात्रियों के आराम के लिए प्रकृति ने एक विशाल हरा कालीन बिछा दिया हो। वहीं दूसरी ओर, तीनों लोकों को तारने वाली पतित-पावनी गंगा नदी बह रही है, जो राजा भगीरथ के महान यश की प्रतीक लगती है। गंगा का पानी इतना साफ़, सफेद और बर्फीला है, मानो चीनी की चाशनी को बर्फ के रूप में जमा दिया गया हो, जिसमें अनगिनत जलीय जीव आनंदपूर्वक क्रीड़ा कर रहे हैं।
3 गद्य खंड 3
यहाँ श्री गंगा जी अपना नाम नदी सत्य करती हैं अर्थात् जल के वेग का शब्द बहुत होता है और शीतल वायु नदी के उन पवित्र छोटे–छोटे कनों को लेकर स्पर्श ही से पावन करता हुआ संचार करता है। यहाँ पर श्री गंगा जी दो धारा हो गई हैं— एक का नाम नील धारा, दूसरी श्री गंगा जी ही के नाम से, इन दोनों धारों के बीच में एक सुंदर नीचा पर्वत है और नील धारा के तट पर एक छोटा–सा सुंदर चुटीला पर्वत है और उसके शिषर पर चण्डिका देवी की मूर्ति है। यहाँ हरि की पैड़ी नामक एक पक्का घाट है और यहीं स्नान भी होता है। विशेष आश्चर्य का विषय यह है कि यहाँ केवल गंगा जी ही देवता हैं, दूसरा देवता नहीं। यों तो वैरागियों ने मठ मंदिर कई बना लिए हैं। श्री गंगा जी का पाट भी बहुत छोटा है पर वेग बड़ा है, तट पर राजाओं की धर्मशाला यात्रियों के उतरने के हेतु बनी हैं और दुकानें भी बनी हैं पर रात को बंद रहती हैं। यह ऐसा निर्मल तीर्थ है कि इच्छा क्रोध की खानि जो मनुष्य हैं सो वहाँ रहते ही नहीं।

📚 कठिन शब्दों के अर्थ

शब्दअर्थ
वेगपानी का तेज़ बहाव
कन (कण)जल की नन्ही-नन्ही बूँदें
चुटीला पर्वतऊँची और नुकीली चोटी वाला पहाड़
हरि की पैड़ीस्नान करने का सबसे प्रमुख और पक्का घाट
पाटनदी के किनारों के बीच की चौड़ाई
खानिभण्डार (जैसे क्रोध से भरे हुए लोग)
इस गद्यांश में भारतेंदु जी कहते हैं कि हरिद्वार में गंगा वास्तव में एक "नदी" (नाद करने वाली) होने का अर्थ सिद्ध करती है, क्योंकि यहाँ उसके पानी के बहाव का शोर बहुत तेज़ और स्पष्ट सुनाई देता है। जब ठंडी हवा गंगा के पानी की बारीक बूँदों को साथ लेकर बहती है, तो वह हवा शरीर को छूते ही आत्मा को पवित्र कर देती है। यहाँ आकर गंगा दो हिस्सों में बँट जाती है—एक 'नीलधारा' और दूसरी 'श्री गंगा'। इन दोनों के बीच और किनारों पर छोटे-छोटे खूबसूरत पहाड़ हैं, जिनमें से एक नुकीली चोटी वाले पहाड़ पर माँ चंडिका का मंदिर स्थित है। यहाँ का सबसे प्रसिद्ध घाट 'हरि की पैड़ी' है जहाँ श्रद्धालु डुबकी लगाते हैं। लेखक इस बात पर अचरज जताते हैं कि इस स्थान पर मुख्य रूप से केवल माँ गंगा की ही आराधना होती है, यद्यपि साधु-संन्यासियों ने अपने-अपने छोटे मंदिर बना लिए हैं। नदी की चौड़ाई यहाँ कम ज़रूर है, लेकिन इसके बहने की गति बहुत प्रचंड है। किनारों पर यात्रियों के आराम के लिए राजाओं द्वारा बनवाई गई कई धर्मशालाएँ हैं। यह जगह इतनी शुद्ध और सात्विक है कि जिन इंसानों के मन में लालच, गुस्सा और बुरे विचार भरे होते हैं, वे इस शांत वातावरण में टिक ही नहीं पाते।
4 गद्य खंड 4
पंडे दुकानदार इत्यादि कनखल व ज्वालापुर से आते हैं। पंडे भी यहाँ बड़े विलक्षण संतोषी हैं। एक पैसे को लाख करके मान लेते हैं। इस क्षेत्र में पाँच तीर्थ मुख्य हैं हरिद्वार, कुशावर्त्त, नीलधारा, विल्वपर्वत और कनखल। हरिद्वार तो हरि की पैंड़ी पर नहाते हैं, कुशावर्त्त भी उसी के पास है, नीलधारा वही दूसरी धारा, विल्व पर्वत भी पास ही एक सुहाना पर्वत है जिस पर विल्वेश्वर महादेव की मूर्ति है और कनखल तीर्थ इधर ही है, यह कनखल तीर्थ बड़ा उत्तम है। किसी काल में दक्ष ने यहीं यज्ञ किया था और यहीं सती ने शिव जी का अपमान न सहकर अपना शरीर भस्म कर दिया। यहाँ कुछ छोटे–छोटे घर भी बने हैं। और भारामल जैकृष्णदास खत्री यहाँ के प्रसिद्ध धनिक हैं।

📚 कठिन शब्दों के अर्थ

शब्दअर्थ
पंडेतीर्थ स्थानों पर पूजा-पाठ संपन्न कराने वाले पुजारी
विलक्षणसबसे अलग या अद्भुत
संतोषीजो थोड़े में भी संतुष्ट और खुश रहे
विल्वेश्वर महादेवविल्व पर्वत पर स्थापित भगवान शिव का स्वरूप
भस्म कर दियाआग में जलकर स्वयं को समाप्त कर लेना
हरिद्वार के स्थानीय जीवन की झलक देते हुए लेखक बताते हैं कि यहाँ की दुकानों और घाटों पर काम करने वाले अधिकांश पुरोहित (पंडे) और व्यापारी आस-पास के ज्वालापुर और कनखल जैसे क्षेत्रों से आते हैं। यहाँ के पंडों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे बहुत ही संतोषी स्वभाव के हैं; यदि उन्हें दान में बहुत कम पैसा भी मिले, तो वे उसे लाखों का खजाना मानकर खुशी-खुशी स्वीकार कर लेते हैं। पूरे हरिद्वार परिक्षेत्र में पाँच प्रमुख धार्मिक स्थल मौजूद हैं- हरिद्वार (हरि की पैड़ी), कुशावर्त्त, गंगा की दूसरी शाखा नीलधारा, भगवान शिव को समर्पित खूबसूरत विल्व पर्वत और कनखल। लेखक कनखल की प्राचीन महिमा पर प्रकाश डालते हुए बताते हैं कि यह वही ऐतिहासिक और पवित्र स्थान है जहाँ राजा दक्ष प्रजापति ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। उसी यज्ञ में जब भगवान शिव का अपमान किया गया, तो माता सती ने क्रोध और दुख में आकर इसी जगह खुद को योगाग्नि में जला लिया था। वर्तमान में यहाँ कई छोटे-छोटे मकान बन गए हैं और भारामल जैकृष्णदास खत्री जैसे धनी व्यापारी इस क्षेत्र में निवास करते हैं।
5 गद्य खंड 5
हरिद्वार में यह बखेड़ा कुछ नहीं है और शुद्ध निर्मल साधुओं के सेवन योग्य तीर्थ है। मेरा तो चित्त वहाँ जाते ही ऐसा प्रसन्न और निर्मल हुआ कि वर्णन के बाहर है। मैं दीवान कृपा राम के घर के ऊपर के बंगले पर टिका था। यह स्थान भी उस क्षेत्र में टिकने योग्य ही है। चारों ओर से शीतल पवन आती थी। यहाँ रात्रि को ग्रहण हुआ और हम लोगों ने ग्रहण में बड़े आनंदपूर्वक स्नान किया और दिन में श्री भागवत का पारायण भी किया। वैसे ही मेरे संग कल्लू जी मित्र भी परमानंदी थे। निदान इस उत्तम क्षेत्र में जितना समय बीता, बड़े आनंद से बीता। एक दिन मैंने श्री गंगा जी के तट पर रसोई करके पत्थर ही पर जल के अत्यंत निकट परोसकर भोजन किया। जल के छलके पास ही ठंढे–ठंढे आते थे। उस समय के पत्थर पर का भोजन का सुख सोने की थाल के भोजन से कहीं बढ़ के था।

📚 कठिन शब्दों के अर्थ

शब्दअर्थ
बखेड़ावाद-विवाद, झगड़ा या उलझन
निर्मलपूरी तरह स्वच्छ और दोषरहित
चित्तव्यक्ति का मन या अंतरात्मा
पारायणकिसी पवित्र ग्रंथ का लगातार श्रद्धापूर्वक पाठ करना
निदानआखिर में या अंततः
छलकेपानी की लहरों के टकराने से उठने वाली फुहारें
लेखक अपने अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि हरिद्वार में शहरी जीवन जैसा कोई शोर-शराबा या मानसिक उलझन नहीं है। यह स्थान सच्चे संन्यासियों और साधकों के रहने के लिए एकदम उचित और पवित्र है। वे बताते हैं कि वहाँ पहुँचते ही उनका मन इतना अधिक प्रफुल्लित और विकार-रहित हो गया था, जिसे शब्दों में बयाँ करना असंभव है। अपनी यात्रा के दौरान वे दीवान कृपा राम के बंगले के ऊपरी हिस्से में रुके थे, जहाँ चारो दिशाओं से ठंडी हवा आती थी। उसी दौरान एक रात ग्रहण का अद्भुत योग बना, जिस अवसर पर लेखक और उनके साथियों ने गंगा में पवित्र स्नान किया और दिन के समय 'श्रीमद्भागवत' ग्रंथ का संपूर्ण पाठ किया। उनके साथ गए मित्र कल्लू जी भी इस भक्तिमय माहौल में मग्न थे। लेखक के जीवन का सबसे अविस्मरणीय पल वह था, जब उन्होंने नदी के बिल्कुल किनारे पत्थरों के बीच स्वयं खाना पकाया। जब वे पत्थर पर ही भोजन रख कर खा रहे थे, तो नदी के पानी की ठंडी फुहारें उनके पास तक आ रही थीं। उस सादे वातावरण में पत्थर पर बैठकर भोजन करने में उन्हें जो दिव्य संतुष्टि मिली, वह राजमहलों में सोने की थालियों में छप्पन भोग खाने से भी कहीं अधिक महान और आनंददायक थी।
6 गद्य खंड 6
चित्त में बारंबार ज्ञान, वैराग्य और भक्ति का उदय होता था। झगड़े– लड़ाई का कहीं नाम भी नहीं था। यहाँ और भी कई वस्तु अच्छी बनती हैं, जनेऊ यहाँ का अच्छा महीन और उज्ज्वल बनता है। यहाँ की कुशा सबसे विलक्षण होती है जिसमें से दालचीनी, जावित्री इत्यादि की अच्छी सुगंध आती है। मानो यह प्रत्यक्ष प्रगट होता है कि यह ऐसी पुण्यभूमि है कि यहाँ की घास भी ऐसी सुगंधमय है। निदान यहाँ जो कुछ है, अपूर्व है और यह भूमि साक्षात विरागमय साधुओं और विरक्तों के सेवन योग्य है। और संपादक महाशय, मैं चित्त से तो अब तक वहीं निवास करता हूँ और अपने वर्णन द्वारा आपके पाठकों को इस पुण्यभूमि का वृत्तांत विदित करके मौनावलंबन करता हूँ। निश्चय है कि आप इस पत्र को स्थानदान दीजिएगा। आपका मित्रयात्री— भारतेंदु हरिश्चंद्र

📚 कठिन शब्दों के अर्थ

शब्दअर्थ
वैराग्यदुनियादारी और मोह-माया से पूरी तरह दूरी बना लेना
जनेऊएक विशेष प्रकार का पवित्र धागा जो धार्मिक कर्मकांडों में पहना जाता है
कुशापूजा-पाठ में इस्तेमाल होने वाली एक अत्यंत पवित्र घास
वृत्तांतपूरा विवरण या घटनाक्रम
मौनावलंबनखामोश हो जाना या चुप रहने का सहारा लेना
स्थानदानपत्र को अपनी पत्रिका में छापने की जगह देना
इस अंतिम भाग में लेखक बता रहे हैं कि हरिद्वार के उस दिव्य वातावरण में उनके हृदय में बार-बार सच्ची समझदारी (ज्ञान), संसार से विरक्ति (वैराग्य) और ईश्वर के प्रति अगाध प्रेम (भक्ति) के भाव उत्पन्न हो रहे थे। वहाँ के समाज में किसी प्रकार के क्रोध या कलह का कोई नामोनिशान नहीं था। लेखक हरिद्वार की कुछ प्रसिद्ध वस्तुओं का ज़िक्र करते हैं—जैसे वहाँ बनाया जाने वाला जनेऊ बहुत ही बारीक और सफ़ेद होता है। वहाँ उगने वाली कुशा घास भी बेहद चमत्कारी है, क्योंकि उसमें से मसालों (जैसे दालचीनी और जावित्री) जैसी प्राकृतिक खुशबू आती है। इस सुगन्धित घास को देखकर ही साबित हो जाता है कि यह भूमि कितनी महान और पवित्र है। कुल मिलाकर, हरिद्वार की हर एक चीज़ अपने आप में अनोखी है और यह स्थान सांसारिक मोह त्याग चुके सच्चे संन्यासियों की साधना के लिए श्रेष्ठ है। अंत में, भारतेंदु जी संपादक से मुखातिब होते हुए कहते हैं कि शरीर से भले ही वे लौट आए हों, लेकिन उनका मन आज भी हरिद्वार में ही अटका हुआ है। वे आशा करते हैं कि उनके इस वृत्तांत को पढ़कर पाठकों को भी हरिद्वार के दर्शन का लाभ मिलेगा। इसी प्रार्थना के साथ वे अपनी लेखनी को विराम देते हैं और संपादक से आग्रह करते हैं कि वे इस पत्र को अपनी पत्रिका में ज़रूर प्रकाशित करें।
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🎯 निष्कर्ष एवं भाषा अध्ययन

निष्कर्ष: भारतेंदु हरिश्चंद्र द्वारा लिखा गया यह पाठ केवल एक भौगोलिक वर्णन न होकर आत्मा को शांति प्रदान करने वाला एक आध्यात्मिक सफर है। हरिद्वार की प्राकृतिक छटा, गंगा का निर्मल जल और वहाँ की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्ता को लेखक ने अत्यंत सरल और भावपूर्ण शब्दों में पिरोया है। यह पाठ हमें यह शिक्षा देता है कि सच्ची खुशी और मानसिक शांति प्रकृति की गोद और सादगी से भरे जीवन में ही प्राप्त की जा सकती है।

भाषा अध्ययन: इस पाठ की भाषा खड़ी बोली हिंदी है, जिसमें लेखक ने संस्कृत के तत्सम शब्दों का अत्यंत सुंदरता के साथ प्रयोग किया है। 'त्रिभुवन पावनी', 'मौनावलंबन', 'मनोरथ' जैसे शब्द भाषा की गांभीर्यता को बढ़ाते हैं। इसके साथ ही लेखक ने उपमा अलंकार का बहुत ही सटीक उपयोग किया है (जैसे- "सज्जनों के शुभ मनोरथों की भाँति" और "चीनी के पने को बरफ में जमाया है") जिससे प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन अत्यंत सजीव और प्रभावशाली बन पड़ा है। पूरे पाठ की शैली वर्णनात्मक और भक्तिरस से परिपूर्ण है।

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📖 समानार्थी शब्द

  • पर्वत: पहाड़, गिरि, अचल
  • वृक्ष: पेड़, तरु, पादप
  • जल: पानी, नीर, वारि
  • निर्मल: शुद्ध, स्वच्छ, पवित्र
  • वायु: हवा, पवन, समीर
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📝 बोधात्मक प्रश्न

प्रश्न 1. भारतेंदु हरिश्चंद्र ने हरिद्वार के विशाल वृक्षों का मानवीकरण किस प्रकार किया है और उनके किन गुणों को दर्शाया है?

लेखक ने विशाल वृक्षों की तुलना एक पैर पर खड़े तपस्वियों से की है, जो धूप, ओस और वर्षा सहते हुए भी दूसरों का भला करते हैं। इनके फल, फूल, छाया से लेकर राख तक इंसान के काम आती है। पत्थर मारने पर भी ये फल देते हैं, जो इनके परोपकारी स्वभाव को दर्शाता है।

प्रश्न 2. 'यहाँ श्री गंगा जी अपना नाम नदी सत्य करती हैं'—लेखक के इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।

संस्कृत में 'नदी' शब्द 'नाद' (आवाज़/शोर) से बना है। लेखक का आशय है कि हरिद्वार में गंगा के जल का वेग इतना तीव्र है कि उसके बहने की तेज़ आवाज़ स्पष्ट सुनाई देती है, जिससे वह अपने नाम (नदी) को सार्थक करती है।

प्रश्न 3. हरिद्वार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पाँच प्रमुख तीर्थ स्थान कौन-कौन से हैं? उनका संक्षिप्त वर्णन करें।

पाँच प्रमुख तीर्थ हैं— 1. हरिद्वार (जहाँ हरि की पैड़ी पर स्नान होता है), 2. कुशावर्त्त (हरि की पैड़ी के पास), 3. नीलधारा (गंगा की दूसरी धारा), 4. विल्व पर्वत (जहाँ विल्वेश्वर महादेव की मूर्ति है), और 5. कनखल (जहाँ दक्ष ने यज्ञ किया था और माता सती ने देह त्यागी थी)।

प्रश्न 4. लेखक को सोने की थाली की बजाय गंगा के तट पर पत्थर पर बैठकर भोजन करना अधिक सुखदायक क्यों प्रतीत हुआ?

गंगा तट का प्राकृतिक और आध्यात्मिक वातावरण अत्यंत निर्मल था। नदी की ठंडी फुहारें, शांत माहौल और सादगी से भरा वह पल लेखक को इतना अलौकिक लगा कि वह सुख राजमहलों में सोने की थाली में खाने से भी अधिक उत्तम प्रतीत हुआ।

प्रश्न 5. हरिद्वार के वातावरण का लेखक के मानसिक पटल पर क्या आध्यात्मिक प्रभाव पड़ा?

हरिद्वार पहुँचते ही लेखक का मन अत्यंत प्रसन्न और शुद्ध हो गया। उनके हृदय से सारे विकार मिट गए और बार-बार उनके मन में ज्ञान, वैराग्य और ईश्वर के प्रति भक्ति की भावना जागृत होने लगी।

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❓ अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न 1: 'हरिद्वार' पाठ के रचयिता कौन हैं और यह किस विधा की रचना है?
उत्तर: इस पाठ के रचयिता हिंदी के प्रसिद्ध साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र हैं। यह एक यात्रा-वृत्तांत है, जिसे उन्होंने एक पत्र के रूप में लिखा था।
प्रश्न 2: लेखक ने यह पत्र किसे लिखा था?
उत्तर: लेखक ने यह पत्र 'कविवचन सुधा' पत्रिका के संपादक को लिखा था।
प्रश्न 3: लेखक ने गंगा जल की तुलना किससे की है?
उत्तर: लेखक ने गंगा के अत्यंत शीतल और स्वच्छ जल की तुलना बर्फ में जमाए गए चीनी के शरबत से की है।
प्रश्न 4: कनखल तीर्थ का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व क्या है?
उत्तर: पौराणिक कथाओं के अनुसार, कनखल वह पवित्र स्थान है जहाँ राजा दक्ष ने यज्ञ का आयोजन किया था और माता सती ने भगवान शिव का अपमान न सह पाने के कारण स्वयं को अग्नि में भस्म कर लिया था।
प्रश्न 5: हरिद्वार में कौन सी घास विशेष रूप से सुगन्धित होती है?
उत्तर: हरिद्वार की 'कुशा' घास अत्यंत विशेष होती है, जिससे दालचीनी और जावित्री जैसी सुगंध आती है।