दो गौरैया पाठ सार, लेखक परिचय, शब्दार्थ, व्याख्या और महत्वपूर्ण प्रश्न
भीष्म साहनी द्वारा रचित ‘दो गौरैया’ पाठ का सरल सार, लेखक परिचय, गद्य खंडवार व्याख्या, कठिन शब्दार्थ और परीक्षा उपयोगी सामग्री
01 लेखक परिचय
भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार और नाटककार थे। उनका जन्म 8 अगस्त 1915 को रावलपिंडी में हुआ था। वे सरल भाषा, गहरी संवेदना और मानवीय मूल्यों के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। उनकी रचनाओं में समाज, मनुष्य और जीवन की सच्चाइयों का बहुत सहज और प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
भीष्म साहनी ने कहानी, उपन्यास, नाटक और संस्मरण जैसी अनेक विधाओं में लेखन किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में तमस विशेष रूप से प्रसिद्ध है। ‘दो गौरैया’ जैसे पाठों में उनकी संवेदनशील दृष्टि और जीव-जंतुओं के प्रति करुणा स्पष्ट दिखाई देती है।
02 दो गौरैया पाठ सार
‘दो गौरैया’ कहानी में लेखक भीष्म साहनी ने अपने बचपन के दिनों का एक बहुत ही रोचक और मार्मिक किस्सा साझा किया है। लेखक का घर कबूतरों, चमगादड़ों, चूहों और चींटियों जैसे कई जीवों का अड्डा बना हुआ था, जिसे देखकर पिताजी अक्सर कहते थे कि यह घर सराय बन गया है।
एक दिन दो गौरैयों ने उनके घर की बैठक में लगे पंखे पर अपना घोंसला बना लिया। पिताजी को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया और उन्होंने चिड़ियों को भगाने की ठान ली। उन्होंने चिड़ियों को डराने, दरवाजे-रोशनदान बंद करने और लाठी से उन्हें खदेड़ने के कई प्रयास किए। लेखक की माँ इस पूरी घटना पर पिताजी का मज़ाक उड़ाती रहीं।
अंत में परेशान होकर जब पिताजी स्टूल पर चढ़कर वह घोंसला तोड़ने लगे, तभी उन्हें घोंसले के भीतर से चीं-चीं की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने देखा कि नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले हुए हैं। यह दृश्य देखकर पिताजी का गुस्सा शांत हो गया; उनका हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने घोंसला तोड़ने का विचार छोड़ दिया। बाद में वे मुस्कुराते हुए उस चिड़िया के परिवार को दाना चुगते हुए देखते रहे।
03 गद्य खंड, शब्दार्थ और व्याख्या
गद्य खंड -1: घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं— माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं। आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं! घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गरमी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है।
सराय – यात्रियों के ठहरने का स्थान, मेहमान – अतिथि, डेरा डालना – किसी स्थान पर अस्थायी निवास करना, बीसियों – अत्यधिक, बसते – रहते, धमा चौकड़ी – उछल-कूद, हंगामा।
लेखक बताते हैं कि उनके परिवार में केवल तीन ही सदस्य थे—वे स्वयं और उनके माता-पिता। लेकिन घर में पशु-पक्षियों की इतनी भीड़ रहती थी कि पिताजी झल्लाकर कहते थे कि यह कोई घर नहीं, बल्कि एक धर्मशाला है जहाँ असली मालिक ये जीव-जंतु हैं और इंसान केवल मेहमान हैं। घर के आँगन में स्थित आम के पेड़ पर अनेक पक्षियों ने अपना ठिकाना बना रखा था। पिताजी मज़ाक में कहते थे कि मानो पक्षी दिल्ली आते ही सीधा उनके घर का पता पूछते हुए आ जाते हों। पक्षियों के कलरव को लोग भले ही मधुर गीत कहें, लेकिन लेखक के परिवार के लिए वह कान फोड़ने वाला शोर था। बाहर के अलावा घर के भीतर भी अजीबोगरीब स्थिति थी। चूहों की फौज रात-दिन घर में उछल-कूद करती रहती थी, जिससे परिवार की नींद हराम हो जाती थी। कुछ चूहे बर्तन और डिब्बे गिराते, तो कुछ अपनी सुविधा के अनुसार जगहें ढूँढ लेते। एक बूढ़ा चूहा ठंड से बचने के लिए अँगीठी के पीछे छिपता, तो दूसरा गर्मी से राहत पाने के लिए बाथरूम की टंकी पर जा बैठता। बिल्ली भी दूध की तलाश में कभी-कभार मेहमान बनकर घर में झाँक जाती थी।
गद्य खंड -2: मन आया तो अंदर आकर दूध पी गई, न मन आया तो बाहर से ही ‘फिर आऊँगी’ कहकर चली जाती है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़ कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत करने लगते हैं। घर में कबूतर भी हैं। दिन-भर “गुटर गू गुटर गूं’ का संगीत सुनाई देता रहता है। इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बर्रे भी हैं और चींटियों की तो जैसे फीज ही छावनी डाले हुए है। अब एक दिन दो गौरैया सीधी अंदर घुस आईं और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहने लगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर फिर जैसे आई थीं वैसे ही उड़ भी गई। पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उन्होंने अपना बिछावन बिछा लिया है और सामान भी ले आईं हैं और मजे से दोनों बैठी गाना गा रही हैं। जाहिर है, उन्हें घर पसंद आ गया था। माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे। थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोलीं, “अब तो ये नहीं उड़ेंगी। पहले इन्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।”
कसरत – व्यायाम, बर्रे – ततैया, छावनी – डेरा, निरीक्षण – जाँच, बिछावन – बिछौना।
लेखक आगे बताते हैं कि घर में जीवों की कोई कमी नहीं थी। चमगादड़ शाम होते ही कमरों में उड़ान भरने लगते, कबूतर दिनभर अपनी गुटर-गूँ करते रहते और छिपकलियाँ व ततैया भी घर में डेरा डाले हुए थे । चींटियों ने तो जैसे अपना पूरा सैन्य शिविर ही वहाँ लगा रखा था । इसी दौरान एक दिन, दो गौरैयाँ घर के अंदर आईं और घर का कोना-कोना ऐसे परखने लगीं मानो अपने रहने के लिए जगह का मुआयना कर रही हों । कुछ दिन बाद उन दोनों ने बैठक के पंखे के ऊपरी हिस्से में अपना घोंसला तैयार कर लिया । यह देखकर माँ ने पिताजी से कहा कि अब इन्हें भगाना मुश्किल है। अगर घोंसला बनाने से पहले इन्हें डराया जाता तो ये शायद चली जातीं, लेकिन अब इन्होंने यहाँ अपना घर बसा लिया है
गद्य खंड -3: इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरयाँ मेरे आगे क्या चीज हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ।” छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!” माँ ने व्यंग्य से कहा। माँ कोई बात व्यंग्य में कहें, तो पिताजी उबल पड़ते हैं, वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं। वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुँह से ‘श… शू’ कहा, बाँहें झुलाई, फिर खड़े-खड़े कूदने लगे, कभी बाँहें झुलाते, कभी ‘श… शू’ करते । गौरैयों ने घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झाँककर देखा और दोनों एक साथ “चीं-चीं’ करने लगीं। और माँ खिलखिलाकर हँसने लगीं। पिताजी को गुस्सा आ गया, “इसमें हँसने की क्या बात है? माँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है। हँसकर बोली, “चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?” तब पिताजी को और भी ज्यादा गुस्सा आ गया और वह पहले से भी ज्यादा ऊँचा कूदने लगे।
व्यंग्य – मजाक, उबल पड़ना – गुस्सा होना, फौरन – तुरंत, झुलाई – हिलाई।
माँ की यह बात सुनकर पिताजी तिलमिला गए और चुनौती देते हुए बोले कि इन छोटी सी चिड़ियों की क्या मजाल, वे अभी इन्हें घर से बाहर फेंक देंगे । माँ ने उन पर तंज कसते हुए कहा कि जब आप घर से चूहों को तो भगा नहीं पाए, तो इन चिड़ियों को कैसे भगाएंगे । माँ का यह मज़ाक पिताजी को चुभ गया। वे तुरंत उठे और पंखे के नीचे खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे, मुँह से 'शू-शू' की आवाज़ें निकालने लगे और अजीब तरह से हाथ हिलाकर उछलने लगे ताकि चिड़ियाँ डरकर भाग जाएं । उन्हें इस तरह अजीबोगरीब हरकतें करते देख गौरैयाँ घोंसले से बाहर झाँकने लगीं, जिसे देखकर माँ ज़ोर से हँस पड़ीं । माँ ने हँसते हुए कहा कि गौरैयाँ भी हैरान हैं और एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह इंसान इस तरह नाच क्यों रहा है । माँ की इस टिप्पणी ने पिताजी के गुस्से को और भड़का दिया और वे पहले से ज्यादा जोर लगाकर कूदने लगे ।
गद्य खंड -4: गौरैयाँ घोंसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं। उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था। माँ फिर हँसने लगीं, “ये निकलेंगी नहीं, जी। अब इन्होंने अंडे दे दिए होंगे।” “निकलेंगी कैसे नहीं? पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरियाँ फिर घोंसले में जा बैठी थीं। उन्होंने लाठी ऊँची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा । ‘चीं-चीं करती गौरैयाँ उड़कर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं। “इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं।” माँ ने हँसकर कहा। पिताजी लाठी उठाए पर्दे के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाजे पर जा बैठी। दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाजे पर। माँ फिर हँस दी। “तुम तो बड़े समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरैयों को बाहर निकाल रहे हो। एक दरवाजा खुला छोड़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।” अब पिताजी ने मुझे झिड़ककर कहा, “तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाजे बंद कर दे!” मैंने भागकर दोनों दरवाजे बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाजा खुला रहा।
डैने – पंख, लाठी – बड़ा डंडा, ठकोरा – आघात, लपके – तेजी से आगे बढ़ना, झिड़ककर – डाँटकर।
पिताजी की इस उछल-कूद को देखकर गौरैयाँ एक पंखे से उड़कर दूसरे पंखे पर बैठ गईं । माँ ने फिर मज़ाक किया कि अब शायद घोंसले में अंडे आ चुके हैं, इसलिए ये चिड़ियाँ यहाँ से नहीं जाएंगी । लेकिन पिताजी पीछे हटने वाले नहीं थे; वे बाहर से एक बड़ा सा डंडा (लाठी) ले आए और उससे पंखे पर मारना शुरू कर दिया । चिड़ियाँ डरकर पर्दे के डंडे पर जा बैठीं। इस पर माँ ने चुटकी ली कि इतनी मेहनत करने की क्या आवश्यकता थी, बस पंखा चालू कर देते तो ये खुद-ब-खुद भाग जातीं । जब पिताजी डंडा लेकर पर्दे की तरफ लपके तो चिड़ियाँ अलग-अलग दरवाजों पर जा बैठीं । माँ ने फिर उन्हें सलाह दी कि समझदारी इसी में है कि सभी दरवाजे बंद कर दिए जाएं और केवल एक ही दरवाजा खुला रखा जाए, ताकि वे उसी रास्ते से बाहर जाएं । पिताजी ने गुस्से में लेखक को डाँट लगाई और कहा कि चुपचाप खड़े रहने के बजाय जाकर दरवाजे बंद करो। लेखक ने रसोई का दरवाजा खुला छोड़कर बाकी सब बंद कर दिए ।
गद्य खंड -5: पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरैयों पर हमला बोल दिया। एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते लगते बची। चीं-चीं करती चिड़ियाँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं । आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाजे में से बाहर निकल गई। माँ तालियाँ बजाने लगीं। पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे। “आज दरवाजे बंद रखो” उन्होंने हुक्म दिया। एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।” तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। और माँ खिलखिलाकर हँस दी। मैंने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरैयाँ फिर से अपने घोंसले में मौजूद थीं। दरवाजे के नीचे से आ गई हैं, ” माँ बोलीं। मैंने दरवाजे के नीचे देखा । सचमुच दरवाजों के नीचे थोड़ी-थोड़ी जगह खाली थी। पिताजी को फिर गुस्सा आ गया। माँ मदद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं। अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़े। उन्होंने दरवाजों के नीचे कपड़े ठूंस दिए ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़े। चिड़ियाँ चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गई। पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे में मौजूद थीं। अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।
हुक्म – आदेश, पिल पड़े – पूरी ताकत से हमला करना, ठूंसना – घुसाना।
रसोई का दरवाजा खुला छोड़ने के बाद पिताजी ने पूरे ज़ोर से लाठी घुमानी शुरू कर दी । इस आपाधापी में एक बार लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची । घबराई हुई चिड़ियाँ आखिरकार रसोई वाले दरवाज़े से बाहर निकल गईं। यह देखकर माँ ने तालियाँ बजाईं और पिताजी एक विजेता की तरह गर्व से कुर्सी पर बैठ गए । उन्होंने आदेश दिया कि दरवाजे बंद ही रखे जाएं ताकि चिड़ियाँ वापस न आ सकें । लेकिन तभी छत से दोबारा चीं-चीं की आवाज़ आई। माँ हँसने लगीं और लेखक ने देखा कि दोनों गौरैयाँ वापस घोंसले में पहुँच चुकी थीं । दरअसल, वे दरवाजे के नीचे बची हुई खाली जगह से रेंगकर अंदर आ गई थीं । पिताजी का गुस्सा फिर सातवें आसमान पर पहुँच गया क्योंकि माँ मदद करने के बजाय केवल उनका मज़ाक बना रही थीं । अब पिताजी ने दरवाज़ों के नीचे के हर सुराख़ में कपड़े फंसा दिए और फिर से डंडे से चिड़ियों को खदेड़ा । लेकिन इस बार भी चिड़ियाँ हार मानने वाली नहीं थीं; वे रोशनदान के टूटे हुए शीशे से फिर अंदर आ गईं ।
गद्य खंड -6: “देखो – जी, चिड़ियों को मत निकालो,” माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएँगी। क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ?” पिताजी बोले और कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा ठूंस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया। दोनों पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं। इतने में रात पड़ गई। हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए। जाने से पहले मैंने आँगन में झाँककर देखा, चिड़ियाँ वहाँ पर नहीं थीं। मैंने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी। दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं। पिताजी ने फिर लाठी उठा ली। उस दिन उन्हें गोरियों को बाहर निकालने में बहुत देर नहीं लगी। अब तो रोज यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जाती पर रात के वक्त जब हम सो रहे होते, तो न जाने किस रास्ते से वे अंदर घुस आतीं। पिताजी परेशान हो उठे। आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहें, “मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।” पर आखिर वह भी तंग आ गए थे। आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे कि वह गौरैयों का घोंसला नोचकर निकाल देंगे। और वह फौरन ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए।
गंभीरता – सोच-विचार का भाव, कालीन – गलीचा, बरबाद – नष्ट, खदेड़ – भगा देना, इतवार – रविवार, मल्हार – प्रसिद्ध राग, सहनशीलता चुक गई – धैर्य समाप्त हो गया।
इस बार माँ ने मज़ाक छोड़कर गंभीरतापूर्वक पिताजी को समझाया कि अब चिड़ियों को मत सताओ, वे शायद अंडे दे चुकी हैं और अब अपना घर नहीं छोड़ेंगी । मगर पिताजी ने ज़िद में कहा कि वे अपना कीमती कालीन ख़राब नहीं होने देंगे। उन्होंने कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान का शीशा भी कपड़े से बंद कर दिया और फिर से चिड़ियों को बाहर भगा दिया । रात होने पर सब सो गए। लेखक को लगा कि अब चिड़ियाँ हार मान चुकी हैं, लेकिन अगले दिन रविवार की सुबह सबने देखा कि चिड़ियाँ वापस कमरे में मौजूद थीं । अब यह रोज़मर्रा का काम बन गया; दिन में पिताजी उन्हें भगाते और रात में वे किसी न किसी छेद से अंदर आ जातीं । आख़िरकार पिताजी के सब्र का बाँध टूट गया। हालाँकि वे खुद को हार न मानने वाला इंसान बताते थे, लेकिन वे भी रोज़-रोज़ की इस माथापच्ची से तंग आ चुके थे । गुस्से में उन्होंने फैसला किया कि वे इस घोंसले का नामोनिशान मिटा देंगे और उसे तोड़ने के लिए बाहर से एक स्टूल ले आए ।
गद्य खंड -7: घोंसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए। किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए.” उन्होंने गुस्से से कहा। घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखी हो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाई ओर को खींचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे। “चलो, दो तिनके तो निकल गए” माँ हँसकर बोलीं, “अब बाकी दो हजार भी निकल जाएँगे!” तभी मैंने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैयाँ नजर आईं। दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं। इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं। अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए और घोंसला लाठी के इर्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इर्द-गिर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रुई के फाहे और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई, ‘चीं-चीं चीं-चीं!!!”
झालर – लटकन, दुबला – कमजोर, चहक – पक्षियों की आवाज, सिरा – ऊपरी हिस्सा, इर्द-गिर्द – चारों ओर, फाहे – रुई के लच्छे, थिगलियाँ – पैबंद, सहसा – अचानक।
पिताजी स्टूल पर खड़े हो गए। वे गुस्से में बुड़बुड़ा रहे थे कि अगर किसी को असल में भगाना हो, तो सीधा उसका घर ही नष्ट कर देना चाहिए । उन्होंने डंडे के ऊपरी हिस्से को घोंसले में फंसाया और तिनके खींचने शुरू कर दिए। जैसे ही कुछ तिनके नीचे गिरे, माँ ने फिर से व्यंग्य किया कि चलो दो तिनके गिरे, अब बाकी भी गिर ही जाएंगे । इस दौरान लेखक ने गौर किया कि घर की दीवार पर बाहर दोनों गौरैयाँ चुपचाप और उदास बैठी हुई थीं; वे अब पहले जैसी चहक नहीं रही थीं और डरी व कमज़ोर लग रही थीं । इधर पिताजी ने डंडे को घोंसले के अंदर गोल-गोल घुमाना शुरू किया, जिससे घास, धागे और रुई डंडे में लिपट कर घोंसले को तोड़ने लगे। घोंसला टूट ही रहा था कि अचानक उसमें से ज़ोर-ज़ोर से चीं-चीं की आवाज़ें आने लगीं।
गद्य खंड -8: पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरैयाँ लौट आई हैं? मैंने झट से बाहर की ओर देखा नहीं, दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं। “चीं-चीं चीं-चीं!” फिर आवाज आई। मैंने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं। अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोंसले का बहुत-सा हिस्सा था। नन्हीं-नन्हीं दो गौरैयाँ! वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँ है? मैं अवाक् उनकी ओर देखता रहा। फिर मैंने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं। और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुर्सी पर आकर बैठ गए हैं। इस बीच माँ कुर्सी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। नन्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाँफ हाँफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं। उनके माँ-बाप झट से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी नन्हीं-नन्हीं चोंचों में चुग्गा डालने लगे। माँ पिताजी और में उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।
ठिठकना – अचानक रुक जाना, झट से – जल्दी से, गुमसुम – दुखी, अवाक् – स्तब्ध, चुग्गा – पक्षियों का दाना।
घोंसले से आती आवाज़ सुनकर पिताजी के हाथ एकदम रुक गए । उन्होंने सोचा शायद गौरैयाँ अंदर आ गई हैं, लेकिन लेखक ने देखा कि वे तो बाहर दीवार पर ही बैठी थीं । जब उन्होंने ध्यान से ऊपर देखा, तो पंखे के घोंसले में से नन्हीं-नन्हीं चिड़ियों के बच्चे बाहर झाँक रहे थे। वे लगातार आवाज़ कर रहे थे मानो अपने माता-पिता को पुकार रहे हों । लेखक इस दृश्य को देखकर हैरान रह गया। पिताजी का भी हृदय यह सब देखकर पसीज गया। उन्होंने बिना घोंसला पूरा तोड़े डंडा नीचे रख दिया और अफ़सोस के साथ चुपचाप कुर्सी पर बैठ गए । माँ ने समझदारी दिखाते हुए तुरंत घर के सारे दरवाज़े खोल दिए। माता-पिता गौरैयाँ फुर्ती से अंदर आईं और अपने भूखे बच्चों की चोंच में दाना डालने लगीं । कमरे में फिर से चिड़ियों का शोर गूँजने लगा था, लेकिन इस बार पिताजी झुंझलाने के बजाय मुस्कुरा रहे थे। उन्हें इस बात का गहरा सुकून था कि उन्होंने एक बेकसूर परिवार का घर उजड़ने से बचा लिया था ।
04 मुख्य सीख
- हर जीव को अपने घर और जीवन का अधिकार है।
- क्रोध की जगह दया और करुणा अधिक प्रभावशाली होती है।
- प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
- कभी-कभी एक छोटा-सा दृश्य मनुष्य के हृदय को बदल सकता है।
- यह पाठ दयाभाव, सह-अस्तित्व और मानवीय संवेदना की शिक्षा देता है।
05 महत्वपूर्ण प्रश्न
- ‘दो गौरैया’ पाठ के लेखक कौन हैं?
- पिताजी घर को सराय क्यों कहते थे?
- गौरैयों ने अपना घोंसला कहाँ बनाया था?
- माँ पिताजी का मजाक क्यों उड़ाती थीं?
- पिताजी ने गौरैयों को भगाने के लिए कौन-कौन से उपाय किए?
- कहानी में पिताजी का हृदय परिवर्तन किस कारण हुआ?
- इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
06 निष्कर्ष
‘दो गौरैया’ पाठ में लेखक भीष्म साहनी जी ने अपने बालपन के एक बहुत ही सुखद और मार्मिक अनुभव को हमारे सामने रखा है। घर में जीवों के आने पर माता-पिता की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं और आख़िर में करुणा व दयाभाव की जीत को कहानी में बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया गया है।
Q1. ‘दो गौरैया’ पाठ के लेखक कौन हैं?
इस पाठ के लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार भीष्म साहनी हैं।
Q2. पिताजी घर को सराय क्यों कहते थे?
क्योंकि घर में अनेक प्रकार के पक्षी, चूहे, कबूतर, चमगादड़, चींटियाँ आदि रहते थे, इसलिए पिताजी को लगता था कि घर असली मालिकों के बजाय जीव-जंतुओं का अड्डा बन गया है।
Q3. गौरैयों ने अपना घोंसला कहाँ बनाया था?
गौरैयों ने बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में अपना घोंसला बनाया था।
Q4. माँ पिताजी पर क्यों हँसती थीं?
माँ को पिताजी का चिड़ियों को भगाने का तरीका मजेदार लगता था, इसलिए वे बार-बार हँसकर उनका मजाक उड़ाया करती थीं।
Q5. पिताजी ने गौरैयों को भगाने के लिए क्या-क्या किया?
उन्होंने ताली बजाई, ‘शू-शू’ की आवाज निकाली, हाथ-पैर हिलाए, लाठी से डराया, दरवाजे बंद किए, नीचे कपड़े ठूँसे और रोशनदान तक बंद किया।
Q6. पिताजी का हृदय परिवर्तन कब हुआ?
जब वे घोंसला तोड़ रहे थे और भीतर से नन्हीं गौरैयों के बच्चों की चीं-चीं की आवाज आई, तब उनका हृदय परिवर्तन हो गया।
Q7. इस पाठ से क्या शिक्षा मिलती है?
यह पाठ हमें दया, करुणा, सह-अस्तित्व और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता की शिक्षा देता है।
Q8. क्या यह पाठ परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है?
हाँ, इस पाठ से सारांश, शब्दार्थ, व्याख्या, लघु-उत्तरीय और दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
📚 More Chapters:
CH-1 स्वदेश (Class 8 Malhar Chapter 1) – पाठ परिचय, सार, व्याख्या, भावार्थ और Complete Notes
CH-2 दो गौरैया (Class 8 Malhar Chapter 2) – कहानी का सार, प्रश्नोत्तर और Complete Explanation
CH-3 एक आशीर्वाद (Class 8 Malhar Chapter 3) – कविता का सार, व्याख्या, भावार्थ और Notes
CH-4 हरिद्वार (Class 8 Malhar Chapter 4) – पाठ सार, प्रश्नोत्तर और आसान व्याख्या
CH-5 कबीर के दोहे (Class 8 Malhar Chapter 5) – अर्थ, भावार्थ, व्याख्या और Important Notes
CH-6 एक टोकरी भर मिट्टी (Class 8 Malhar Chapter 6) – कहानी का सार, प्रश्नोत्तर और Full Notes
CH-7 मत बाँधो (Class 8 Malhar Chapter 7) – कविता की व्याख्या, भावार्थ और Complete Notes
CH-8 नए मेहमान (Class 8 Malhar Chapter 8) – पाठ सार, प्रश्नोत्तर और सरल व्याख्या
CH-9 आदमी का अनुपात (Class 8 Malhar Chapter 9) – पाठ का अर्थ, सार और Important Question Answer
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