दो गौरैया पाठ सार, शब्दार्थ, व्याख्या और महत्वपूर्ण प्रश्न
भीष्म साहनी द्वारा रचित ‘दो गौरैया’ पाठ का सरल सार, भागवार व्याख्या, कठिन शब्दार्थ और परीक्षा उपयोगी सामग्री
‘दो गौरैया’ कहानी में लेखक भीष्म साहनी ने अपने बचपन के दिनों का एक बहुत ही रोचक और मार्मिक किस्सा साझा किया है। लेखक का घर कबूतरों, चमगादड़ों, चूहों और चींटियों जैसे कई जीवों का अड्डा बना हुआ था, जिसे देखकर पिताजी अक्सर कहते थे कि यह घर सराय बन गया है।
एक दिन दो गौरैयों ने उनके घर की बैठक में लगे पंखे पर अपना घोंसला बना लिया। पिताजी को यह बिल्कुल पसंद नहीं आया और उन्होंने चिड़ियों को भगाने की ठान ली। उन्होंने चिड़ियों को डराने, दरवाजे-रोशनदान बंद करने और लाठी से उन्हें खदेड़ने के कई प्रयास किए। लेखक की माँ इस पूरी घटना पर पिताजी का मज़ाक उड़ाती रहीं।
अंत में परेशान होकर जब पिताजी स्टूल पर चढ़कर वह घोंसला तोड़ने लगे, तभी उन्हें घोंसले के भीतर से चीं-चीं की आवाज़ सुनाई दी। उन्होंने देखा कि नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ सिर निकाले हुए हैं। यह दृश्य देखकर पिताजी का गुस्सा शांत हो गया; उनका हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने घोंसला तोड़ने का विचार छोड़ दिया। बाद में वे मुस्कुराते हुए उस चिड़िया के परिवार को दाना चुगते हुए देखते रहे।
पाठ: घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं— माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं। आँगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है, पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते हैं, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरैयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं! घर के अंदर भी यही हाल है। बीसियों तो चूहे बसते हैं। रात भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं। एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सर्दी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है। उसे शायद गरमी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है।
सराय – यात्रियों के ठहरने का स्थान, मेहमान – अतिथि, डेरा डालना – किसी स्थान पर अस्थायी निवास करना, बीसियों – अत्यधिक, बसते – रहते, धमा चौकड़ी – उछल-कूद, हंगामा।
लेखक बताते हैं कि उनके परिवार में केवल तीन ही सदस्य थे—वे स्वयं और उनके माता-पिता। लेकिन घर में पशु-पक्षियों की इतनी भीड़ रहती थी कि पिताजी झल्लाकर कहते थे कि यह कोई घर नहीं, बल्कि एक धर्मशाला है जहाँ असली मालिक ये जीव-जंतु हैं और इंसान केवल मेहमान हैं। घर के आँगन में स्थित आम के पेड़ पर अनेक पक्षियों ने अपना ठिकाना बना रखा था। पिताजी मज़ाक में कहते थे कि मानो पक्षी दिल्ली आते ही सीधा उनके घर का पता पूछते हुए आ जाते हों। पक्षियों के कलरव को लोग भले ही मधुर गीत कहें, लेकिन लेखक के परिवार के लिए वह कान फोड़ने वाला शोर था। बाहर के अलावा घर के भीतर भी अजीबोगरीब स्थिति थी। चूहों की फौज रात-दिन घर में उछल-कूद करती रहती थी, जिससे परिवार की नींद हराम हो जाती थी। कुछ चूहे बर्तन और डिब्बे गिराते, तो कुछ अपनी सुविधा के अनुसार जगहें ढूँढ लेते। एक बूढ़ा चूहा ठंड से बचने के लिए अँगीठी के पीछे छिपता, तो दूसरा गर्मी से राहत पाने के लिए बाथरूम की टंकी पर जा बैठता। बिल्ली भी दूध की तलाश में कभी-कभार मेहमान बनकर घर में झाँक जाती थी।
भाग 2 का भाव: घर में जीवों की कोई कमी नहीं थी। चमगादड़ शाम होते ही कमरों में उड़ान भरते, कबूतर दिनभर गुटर-गूँ करते, छिपकलियाँ और बर्रे भी घर में रहते थे। चींटियों ने तो मानो छावनी डाल रखी थी। इसी बीच दो गौरैयाँ घर के भीतर आईं और मकान का निरीक्षण करने लगीं। थोड़े दिनों बाद उन्होंने बैठक के पंखे के गोले में अपना घोंसला बना लिया। माँ ने समझ लिया कि अब इन्हें भगाना आसान नहीं होगा।
कसरत – व्यायाम, बर्रे – ततैया, छावनी – डेरा, निरीक्षण – जाँच, बिछावन – बिछौना।
लेखक आगे बताते हैं कि घर के बाहर ही नहीं, भीतर भी अनेक जीव रहते थे। ऐसे वातावरण में दो गौरैयाँ घर के अंदर आईं और जगह-जगह बैठकर मानो यह परखने लगीं कि घर उनके रहने योग्य है या नहीं। थोड़े समय बाद उन्होंने बैठक में लगे पंखे के ऊपर अपना बिछावन जमा लिया और घोंसला बना लिया। माँ ने स्पष्ट रूप से समझ लिया कि अब यह उनका घर बन चुका है।
भाग 3 का भाव: पिताजी को यह बात पसंद नहीं आई। वे ताली बजाकर, ‘शू-शू’ की आवाज निकालकर और हाथ-पैर हिलाकर गौरैयों को डराने लगे। माँ उनकी हरकत देखकर हँसने लगीं और मजाक में बोलीं कि चिड़ियाँ आपस में पूछ रही होंगी कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है। इससे पिताजी और अधिक क्रोधित हो गए।
व्यंग्य – मजाक, उबल पड़ना – गुस्सा होना, फौरन – तुरंत, झुलाई – हिलाई।
माँ की बातों से पिताजी को लगा कि उनका मजाक उड़ाया जा रहा है। वे तुरंत उठे और चिड़ियों को डराने का अनोखा तरीका अपनाने लगे। लेकिन गौरैयाँ डरने के बजाय घोंसले से सिर निकालकर देखने लगीं। माँ ने पिताजी की इस स्थिति पर हँसते हुए और चुटकी ली, जिससे उनका गुस्सा और भड़क उठा।
भाग 4 का भाव: गौरैयाँ एक पंखे से उड़कर दूसरे पर जा बैठीं। माँ ने फिर कहा कि शायद अब वे अंडे दे चुकी हैं। पिताजी लाठी उठा लाए और पंखे के गोले को ठकठकाकर चिड़ियों को डराने लगे। माँ ने सलाह दी कि एक ही दरवाजा खुला रखना चाहिए, तब वे बाहर निकलेंगी। पिताजी ने लेखक से बाकी दरवाजे बंद करने को कहा।
डैने – पंख, लाठी – बड़ा डंडा, ठकोरा – आघात, लपके – तेजी से आगे बढ़ना, झिड़ककर – डाँटकर।
पिताजी ने अब चिड़ियों को भगाने को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया। वे डंडा लेकर उनके पीछे दौड़े। माँ बार-बार व्यावहारिक सलाह देती रहीं, पर साथ ही हँसती भी रहीं। अंत में पिताजी ने घर के रास्ते सीमित कर दिए ताकि गौरैयाँ उसी एक खुले दरवाजे से बाहर निकलें।
भाग 5 का भाव: बड़ी मुश्किल से गौरैयाँ बाहर निकाली गईं, पर थोड़ी ही देर में वे फिर घोंसले में पहुँच गईं। वे दरवाजे के नीचे की खाली जगह से अंदर आ गई थीं। पिताजी ने कपड़े ठूँस दिए, फिर भी गौरैयाँ रोशनदान के टूटे शीशे से वापस आ गईं। इससे पिताजी बहुत परेशान हो गए।
हुक्म – आदेश, पिल पड़े – पूरी ताकत से हमला करना, ठूंसना – घुसाना।
इस भाग में गौरैयों की दृढ़ता दिखाई देती है। चाहे पिताजी जितनी कोशिश कर लें, वे किसी न किसी रास्ते से फिर अपने घर पहुँच जाती थीं। पिताजी के लिए यह आश्चर्य और झुंझलाहट का कारण था, जबकि माँ के लिए यह एक मनोरंजक दृश्य बन गया था।
भाग 6 का भाव: माँ ने गंभीरता से कहा कि अब चिड़ियों को मत भगाइए, शायद उन्होंने अंडे दे दिए हों। पर पिताजी अपनी जिद पर अड़े रहे। अब यह रोज का काम बन गया—दिन में वे बाहर निकाली जातीं और रात को फिर लौट आतीं। आखिरकार पिताजी ने तय कर लिया कि अब वे उनका घोंसला ही तोड़ देंगे।
गंभीरता – सोच-विचार का भाव, कालीन – गलीचा, बरबाद – नष्ट, खदेड़ – भगा देना, इतवार – रविवार, मल्हार – प्रसिद्ध राग, सहनशीलता चुक गई – धैर्य समाप्त हो गया।
अब स्थिति केवल हँसी-मजाक तक सीमित नहीं रही थी। पिताजी रोज-रोज की परेशानी से तंग आ चुके थे। माँ ने पहली बार गंभीर होकर कहा कि अब इन्हें रहने दिया जाए, लेकिन पिताजी अपनी चीजों की सुरक्षा और सफाई को लेकर चिंतित थे। अंत में उनका धैर्य टूट गया और उन्होंने घोंसला उजाड़ने का निर्णय कर लिया।
भाग 7 का भाव: पिताजी स्टूल पर चढ़े और लाठी से घोंसला तोड़ने लगे। तिनके नीचे गिरने लगे। माँ ने फिर व्यंग्य किया। बाहर दीवार पर दोनों गौरैयाँ उदास और चुप बैठी थीं। जैसे-जैसे घोंसला टूटता गया, भीतर से अचानक ज़ोर की चीं-चीं सुनाई दी।
झालर – लटकन, दुबला – कमजोर, चहक – पक्षियों की आवाज, सिरा – ऊपरी हिस्सा, इर्द-गिर्द – चारों ओर, फाहे – रुई के लच्छे, थिगलियाँ – पैबंद, सहसा – अचानक।
घोंसला तोड़ना पिताजी के लिए कठिन नहीं था, पर यह दृश्य मार्मिक था। बाहर बैठी गौरैयाँ अपने घर को टूटता देख रही थीं। उनकी चुप्पी, कमजोरी और उदासी लेखक के मन को छू रही थी। तभी घोंसले के भीतर से बच्चों की आवाज आई, जिसने पूरी स्थिति बदल दी।
भाग 8 का भाव: पिताजी के हाथ रुक गए। ऊपर देखा तो घोंसले में नन्हीं-नन्हीं चिड़ियाँ सिर निकालकर चीं-चीं कर रही थीं। यह देखकर पिताजी का हृदय पिघल गया। उन्होंने लाठी अलग रख दी और नीचे उतर आए। माँ ने दरवाजे खोल दिए। तभी गौरैयाँ अंदर आईं और अपने बच्चों की चोंच में दाना डालने लगीं। अब वही शोर पिताजी को प्यारा लगने लगा।
ठिठकना – अचानक रुक जाना, झट से – जल्दी से, गुमसुम – दुखी, अवाक् – स्तब्ध, चुग्गा – पक्षियों का दाना।
कहानी का सबसे भावुक मोड़ यही है। जैसे ही पिताजी ने देखा कि घोंसले में नन्हे बच्चे हैं, उनका सारा क्रोध समाप्त हो गया। उन्हें एहसास हुआ कि वे केवल तिनके नहीं तोड़ रहे थे, बल्कि एक परिवार का घर उजाड़ रहे थे। उनका हृदय परिवर्तन हो गया और उन्होंने गौरैयों को स्वीकार कर लिया। यह दृश्य करुणा, संवेदना और दयाभाव की विजय को दर्शाता है।
- हर जीव को अपने घर और जीवन का अधिकार है।
- क्रोध की जगह दया और करुणा अधिक प्रभावशाली होती है।
- प्रकृति और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए।
- कभी-कभी एक छोटा-सा दृश्य मनुष्य के हृदय को बदल सकता है।
- माता-पिता की अलग-अलग सोच से परिवार में रोचक स्थितियाँ बनती हैं।
- यह पाठ दयाभाव, सह-अस्तित्व और मानवीय संवेदना की शिक्षा देता है।
- ‘दो गौरैया’ पाठ के लेखक कौन हैं?
- पिताजी घर को सराय क्यों कहते थे?
- गौरैयों ने अपना घोंसला कहाँ बनाया था?
- माँ पिताजी का मजाक क्यों उड़ाती थीं?
- पिताजी ने गौरैयों को भगाने के लिए कौन-कौन से उपाय किए?
- कहानी में पिताजी का हृदय परिवर्तन किस कारण हुआ?
- इस पाठ से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
‘दो गौरैया’ पाठ में लेखक भीष्म साहनी जी ने अपने बालपन के एक बहुत ही सुखद और मार्मिक अनुभव को हमारे सामने रखा है। घर में जीवों के आने पर माता-पिता की अलग-अलग प्रतिक्रियाओं और आख़िर में करुणा व दयाभाव की जीत को कहानी में बहुत ही सुंदर ढंग से पिरोया गया है।
Q1. ‘दो गौरैया’ पाठ के लेखक कौन हैं?
इस पाठ के लेखक प्रसिद्ध साहित्यकार भीष्म साहनी हैं।
Q2. पिताजी घर को सराय क्यों कहते थे?
क्योंकि घर में अनेक प्रकार के पक्षी, चूहे, कबूतर, चमगादड़, चींटियाँ आदि रहते थे, इसलिए पिताजी को लगता था कि घर असली मालिकों के बजाय जीव-जंतुओं का अड्डा बन गया है।
Q3. गौरैयों ने अपना घोंसला कहाँ बनाया था?
गौरैयों ने बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में अपना घोंसला बनाया था।
Q4. माँ पिताजी पर क्यों हँसती थीं?
माँ को पिताजी का चिड़ियों को भगाने का तरीका मजेदार लगता था, इसलिए वे बार-बार हँसकर उनका मजाक करती थीं।
Q5. पिताजी ने गौरैयों को भगाने के लिए क्या-क्या किया?
उन्होंने ताली बजाई, ‘शू-शू’ की आवाज निकाली, हाथ-पैर हिलाए, लाठी से डराया, दरवाजे बंद किए, नीचे कपड़े ठूँसे और रोशनदान तक बंद किया।
Q6. पिताजी का हृदय परिवर्तन कब हुआ?
जब वे घोंसला तोड़ रहे थे और भीतर से नन्हीं गौरैयों के बच्चों की चीं-चीं की आवाज आई, तब उनका हृदय परिवर्तन हो गया।
Q7. इस पाठ से क्या शिक्षा मिलती है?
यह पाठ हमें दया, करुणा, सह-अस्तित्व और जीव-जंतुओं के प्रति संवेदनशीलता की शिक्षा देता है।
Q8. क्या यह पाठ परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है?
हाँ, इस पाठ से सारांश, शब्दार्थ, व्याख्या, लघु-उत्तरीय और दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
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