क्या लिखूँ?
मुख्य विषय: निबंध लेखन की प्रक्रिया, लेखन की कठिनाई, अनुभव-आधारित लेखन, समाज-सुधार और “दूर के ढोल सुहावने” लोकोक्ति का अर्थ।

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पाठ का परिचय
पाठ का नाम: क्या लिखूँ?
लेखक: पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी
विधा: निबंध
मुख्य विषय: निबंध लेखन की प्रक्रिया, लेखन की कठिनाई, अनुभव-आधारित लेखन, समाज-सुधार और “दूर के ढोल सुहावने” लोकोक्ति का अर्थ।
इस निबंध में लेखक ने निबंध लिखने की प्रक्रिया को बहुत रोचक और आत्मीय शैली में समझाया है। लेखक को दो विषयों— “दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार”—पर निबंध लिखना है। इन्हीं दो विषयों के बहाने लेखक निबंध-लेखन की कठिनाइयों, आदर्श निबंध की विशेषताओं, शैली, रूपरेखा, अनुभव और विचारों की भूमिका पर चर्चा करते हैं। NCERT परिचय में भी इस पाठ को निबंध-रचना की प्रक्रिया से जुड़ा बताया गया है।
लेखक परिचय
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार, आलोचक, कवि और हास्य-व्यंग्यकार थे। उनका जन्म सन 1894 में खैरागढ़, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ में हुआ था। निबंध लेखन में उनका विशेष योगदान माना जाता है। उनकी रचनाओं में समाज, लोकजीवन, भारतीय कृषि, अध्यात्म और सामाजिक संबंधों का विचारपूर्ण विश्लेषण मिलता है। उनका निधन सन 1971 में हुआ।
पाठ का पूरा सारांश
“क्या लिखूँ?” एक आत्मपरक और व्यंग्यात्मक निबंध है। लेखक को आज निबंध लिखना ही है, लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे क्या और कैसे लिखें। लेखक सबसे पहले अंग्रेज़ी निबंधकार ए.जी. गार्डिनर के विचार का उल्लेख करते हैं। गार्डिनर का मानना है कि लेखन एक विशेष मानसिक स्थिति में होता है। जब मन में भावों का आवेग उठता है, तब कोई भी विषय केवल बहाना बन जाता है। असली महत्त्व विषय का नहीं, बल्कि लेखक के मनोभावों का होता है।
लेखक इस विचार से सहमत तो हैं, लेकिन अपनी कठिनाई भी बताते हैं। उनके भीतर भाव अपने-आप नहीं उठते; उन्हें सोचना पड़ता है, चिंतन करना पड़ता है और परिश्रम करना पड़ता है। इस बार उन्हें और अधिक मेहनत करनी है क्योंकि नमिता ने उनसे “दूर के ढोल सुहावने” पर और अमिता ने “समाज-सुधार” पर आदर्श निबंध माँगा है।
लेखक सोचते हैं कि आदर्श निबंध लिखने से पहले निबंध-शास्त्र के आचार्यों की राय जानना चाहिए। कुछ विद्वानों के अनुसार निबंध छोटा होना चाहिए, क्योंकि बहुत लंबे निबंध में रचना की सुंदरता कम हो सकती है। फिर लेखक समझते हैं कि निबंध के दो मुख्य अंग हैं— सामग्री और शैली। सामग्री के लिए अध्ययन, मनन और शोध चाहिए, लेकिन लेखक के पास समय कम है। उन्हें दो घंटे में दो निबंध लिखने हैं और उनके पास कोई विश्वकोश या संदर्भ ग्रंथ भी नहीं है।
इसके बाद लेखक रूपरेखा बनाने की बात करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि निबंध लिखने के बाद उसका सार निकालना आसान हो सकता है, पर लिखने से पहले रूपरेखा बनाना उनके लिए कठिन है। वे गार्डिनर और शेक्सपीयर का उदाहरण देते हुए बताते हैं कि बड़े लेखकों को भी शीर्षक और नामकरण में कठिनाई होती रही है।
फिर लेखक शैली पर विचार करते हैं। विद्वान कहते हैं कि भाषा में प्रवाह होना चाहिए और वाक्य छोटे-छोटे होने चाहिए। लेखक व्यंग्यपूर्वक कहते हैं कि वे मास्टर हैं, इसलिए अपनी विद्वता दिखाने के लिए बड़े और जटिल वाक्य लिखना भी ज़रूरी समझते हैं। वे बाणभट्ट, श्रीहर्ष और सेनापति जैसे साहित्यकारों का उल्लेख करके कठिन भाषा और अलंकारों की परंपरा की ओर संकेत करते हैं।
इसके बाद लेखक फ्रांसीसी निबंधकार मोंतेन की पद्धति का उल्लेख करते हैं। मोंतेन की पद्धति में लेखक अपने देखे, सुने और अनुभव किए हुए जीवन को सहज रूप में लिखता है। इसमें लेखक की सच्ची अनुभूति और निजी भाव प्रमुख होते हैं। लेखक को यह तरीका अच्छा लगता है क्योंकि इससे वे अपने अनुभवों के आधार पर लिख सकते हैं।
फिर लेखक को अमीर खुसरो की कहानी याद आती है। कहानी में चार स्त्रियाँ अलग-अलग विषयों— खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल—पर कविता सुनना चाहती हैं। खुसरो एक ही रचना में चारों विषयों को मिला देते हैं। लेखक इसी तरकीब को अपनाते हैं और तय करते हैं कि वे दोनों विषयों— “दूर के ढोल सुहावने” और “समाज-सुधार”—को एक ही निबंध में जोड़ देंगे।
अब लेखक “दूर के ढोल सुहावने” की व्याख्या करते हैं। ढोल पास से बहुत तेज़ और कर्कश लग सकता है, लेकिन दूर से वही आवाज़ मधुर और मनोहर लगती है। दूर बैठे व्यक्ति को ढोल की आवाज़ में विवाह, उत्सव, आनंद और प्रेम का संगीत सुनाई देता है। इसलिए दूर की वस्तु या स्थिति अक्सर अच्छी लगती है, क्योंकि दूरी से उसकी वास्तविक कठिनाइयाँ दिखाई नहीं देतीं।
इसी आधार पर लेखक तरुणों और वृद्धों की मानसिकता की तुलना करते हैं। युवा लोग भविष्य को सुंदर मानते हैं क्योंकि वे जीवन-संघर्ष से अभी दूर होते हैं। वृद्ध लोग अतीत को सुखद मानते हैं क्योंकि वे अपनी युवावस्था और बचपन को याद करते हैं। युवा भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं, जबकि वृद्ध अतीत को वर्तमान में देखना चाहते हैं। इसलिए वर्तमान हमेशा असंतोष और सुधार की मांग से भरा रहता है।
अंत में लेखक समाज-सुधार की बात करते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य के इतिहास में ऐसा कोई समय नहीं रहा जब सुधार की आवश्यकता न रही हो। जीवन में नए दोष पैदा होते हैं और नए सुधार भी होते हैं। जो कभी सुधार था, वह आगे चलकर दोष भी बन सकता है और फिर उसके लिए नया सुधार चाहिए। इसी कारण जीवन को प्रगतिशील माना गया है।
पाठ का केंद्रीय भाव
इस निबंध का केंद्रीय भाव यह है कि लेखन केवल विषय पर जानकारी लिख देना नहीं है, बल्कि लेखक के अनुभव, भाव, चिंतन, शैली और दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति है। लेखक निबंध-लेखन की कठिनाइयों को हास्य, व्यंग्य और आत्मीयता के साथ समझाते हैं। साथ ही वे यह भी बताते हैं कि दूर से कोई वस्तु या स्थिति अच्छी लग सकती है, लेकिन निकट जाकर उसका यथार्थ समझ आता है।
शीर्षक “क्या लिखूँ?” की सार्थकता
यह शीर्षक अत्यंत सार्थक है क्योंकि पूरे निबंध में लेखक इसी दुविधा से जूझते हैं कि वे क्या लिखें और कैसे लिखें। उन्हें दो विषयों पर आदर्श निबंध लिखना है, लेकिन वे लेखन की प्रक्रिया, विषय, सामग्री, रूपरेखा और शैली की समस्या में उलझ जाते हैं। इसलिए “क्या लिखूँ?” शीर्षक लेखक की मानसिक स्थिति और पूरे निबंध की मूल समस्या को प्रकट करता है।
पाठ की प्रमुख विशेषताएँ
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| आत्मपरक शैली | लेखक स्वयं पाठक से संवाद करता हुआ प्रतीत होता है। |
| हास्य-व्यंग्य | लेखक अपनी कठिनाई को रोचक ढंग से प्रस्तुत करता है। |
| विचारात्मकता | पाठ में लेखन, समाज-सुधार, पीढ़ीगत दृष्टि और जीवन की प्रगति पर विचार है। |
| उदाहरणों का प्रयोग | गार्डिनर, मोंतेन, शेक्सपीयर, अमीर खुसरो आदि के संदर्भ दिए गए हैं। |
| लोकोक्ति का विस्तार | “दूर के ढोल सुहावने” को गहराई से समझाया गया है। |
| निबंध-लेखन की प्रक्रिया | सामग्री, शैली, रूपरेखा, अनुभव और भावों की भूमिका बताई गई है। |
महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
लेखक को निबंध लिखने में कठिनाई इसलिए हो रही थी क्योंकि उन्हें दो अलग-अलग विषयों पर आदर्श निबंध लिखने थे। नमिता “दूर के ढोल सुहावने” पर निबंध चाहती थी और अमिता “समाज-सुधार” पर। लेखक को विषय, सामग्री, रूपरेखा और शैली सभी पर विचार करना पड़ रहा था।
NCERT “मेरे उत्तर मेरे तर्क” — उत्तर संकेत
NCERT अभ्यास में दिए गए MCQ भाग में निबंध के भाव, मोंतेन की पद्धति, युवा-वृद्ध तुलना, अमीर खुसरो की कथा और समाज-सुधार से जुड़े प्रश्न दिए गए हैं।
| प्रश्न | सही उत्तर | कारण |
|---|---|---|
| 1 | क | “हैट” लेखक के भावों और “खूँटी” विषय का प्रतीक है; भाव विषय से अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। |
| 2 | घ | मोंतेन की पद्धति अनुभव-आधारित स्वच्छंद लेखन को महत्त्व देती है। |
| 3 | घ | तरुणों का आधार अभिलाषा है और वृद्धों का आधार अनुभव। |
| 4 | ख | अमीर खुसरो की कथा कई विषयों को एक साथ जोड़ने की प्रतिभा दिखाती है। |
| 5 | क | लेखक के अनुसार सुधार की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है। |
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
Competency-Based (बोधात्मक) Questions with Answers
| मूल्य | पाठ से संबंध |
|---|---|
| मौलिकता | लेखक अनुभव-आधारित लेखन को महत्त्व देता है। |
| आत्मचिंतन | लेखक स्वयं से प्रश्न करता है कि क्या और कैसे लिखा जाए। |
| व्यावहारिकता | निबंध लेखन में सामग्री, रूपरेखा और शैली की जरूरत बताई गई है। |
| सामाजिक चेतना | समाज-सुधार की आवश्यकता पर विचार किया गया है। |
| परिवर्तनशीलता | जीवन को प्रगतिशील माना गया है। |
| अनुभव का महत्व | दूर की कल्पना और निकट के अनुभव का अंतर समझाया गया है। |
व्याकरण की बात: समास
NCERT अभ्यास में इस पाठ के साथ समास, उपसर्ग-प्रत्यय, भाव-विस्तार, लोकोक्ति और अनुभव-आधारित लेखन की गतिविधियाँ दी गई हैं। समास को दो या अधिक शब्दों के मेल से बने नए शब्द की रचना के रूप में समझाया गया है; साथ ही समास-विग्रह, पूर्वपद-उत्तरपद और समास के प्रमुख भेद भी दिए गए हैं।
समास की परिभाषा
दो या दो से अधिक शब्दों के मेल से बने संक्षिप्त और नए अर्थ वाले शब्द को समास कहते हैं।
उदाहरण
| सामासिक शब्द | समास-विग्रह | समास का प्रकार |
|---|---|---|
| निबंध-रचना | निबंध की रचना | तत्पुरुष |
| निबंधशास्त्र | निबंध का शास्त्र | तत्पुरुष |
| समाज-सुधार | समाज का सुधार | तत्पुरुष |
| जीवन-संग्राम | जीवन का संग्राम | तत्पुरुष |
| अतीत-गौरव | अतीत का गौरव | तत्पुरुष |
| नव-वधू | नई वधू | कर्मधारय |
| लज्जाशील | लज्जा से युक्त | बहुव्रीहि/गुणसूचक संदर्भ |
| भाई-बहन | भाई और बहन | द्वंद्व |
| यथाशक्ति | शक्ति के अनुसार | अव्ययीभाव |
उपसर्ग और प्रत्यय
उपसर्ग
जो शब्दांश मूल शब्द के पहले लगकर नया शब्द बनाते हैं, वे उपसर्ग कहलाते हैं।
| शब्द | मूल शब्द | उपसर्ग | अर्थ |
|---|---|---|---|
| दुर्बोध | बोध | दुर् | कठिन समझ में आने वाला |
| अनादि | आदि | अन् | जिसका आदि न हो |
| असंतोष | संतोष | अ | संतोष का अभाव |
| अस्पष्टता | स्पष्ट | अ | स्पष्ट न होना |
| अनुसरण | सरण/चलना | अनु | पीछे चलना/पालन करना |
प्रत्यय
जो शब्दांश मूल शब्द के अंत में लगकर नया शब्द बनाते हैं, वे प्रत्यय कहलाते हैं।
| शब्द | मूल शब्द | प्रत्यय | अर्थ |
|---|---|---|---|
| सुधारक | सुधार | क | सुधार करने वाला |
| कठिनाई | कठिन | आई | कठिन होने की अवस्था |
| मधुरता | मधुर | ता | मधुर होने का भाव |
| सुंदरता | सुंदर | ता | सुंदर होने का भाव |
| सामाजिक | समाज | इक | समाज से संबंधित |
भाव-विस्तार
वाक्य 1: “जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।”
भाव-विस्तार
युवा अवस्था में व्यक्ति जीवन की वास्तविक कठिनाइयों से पूरी तरह परिचित नहीं होता। इसलिए उसे भविष्य सुंदर, आकर्षक और संभावनाओं से भरा दिखाई देता है। अनुभव की कमी के कारण वह संसार को कल्पना के आधार पर देखता है, वास्तविक संघर्ष के आधार पर नहीं।
वाक्य 2: “मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।”
भाव-विस्तार
समाज हमेशा परिवर्तनशील रहता है। हर समय में कुछ न कुछ दोष, अन्याय या अव्यवस्था पैदा होती है। इन्हें दूर करने के लिए सुधार आवश्यक होते हैं। इसलिए समाज-सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
वाक्य 3: “आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।”
भाव-विस्तार
आज का युवा भविष्य को श्रेष्ठ मानता है, लेकिन जब वह वृद्ध होगा तो अपने ही बीते समय को सुंदर मानने लगेगा। इसका अर्थ है कि समय बदलने के साथ व्यक्ति की दृष्टि भी बदल जाती है।
लेखन अभ्यास: “दूर के ढोल सुहावने” पर छोटा निबंध
दूर से दिखाई देने वाली वस्तु अक्सर हमें सुंदर और आकर्षक लगती है, क्योंकि हम उसके वास्तविक पक्ष को नहीं जानते। यही बात “दूर के ढोल सुहावने” लोकोक्ति में कही गई है। ढोल पास से बहुत तेज़ और कर्कश लग सकता है, लेकिन दूर से वही ध्वनि मधुर प्रतीत होती है। इसी प्रकार कई बार हमें दूसरों का जीवन, नौकरी, पद या सुविधा बहुत अच्छी लगती है, पर उसके पीछे की मेहनत, कठिनाई और संघर्ष हमें दिखाई नहीं देते। इसलिए किसी भी वस्तु या स्थिति का सही मूल्यांकन निकट अनुभव के आधार पर करना चाहिए, केवल दूर से देखकर नहीं।
लेखन अभ्यास: “समाज-सुधार” पर छोटा निबंध
समाज-सुधार का अर्थ है समाज में फैली बुराइयों, अन्याय और असमानताओं को दूर करना। समाज हमेशा बदलता रहता है, इसलिए सुधार की आवश्यकता भी हमेशा बनी रहती है। प्राचीन समय से लेकर आज तक अनेक सुधारकों ने समाज को नई दिशा दी है। आज भी शिक्षा, पर्यावरण, लैंगिक समानता, दिव्यांगजन अधिकार, स्वच्छता और डिजिटल जागरूकता जैसे क्षेत्रों में सुधार की आवश्यकता है। समाज-सुधार केवल बड़े नेताओं का काम नहीं है; हर नागरिक अपने व्यवहार, सोच और जिम्मेदारी से समाज को बेहतर बना सकता है।
अतिरिक्त MCQ Practice
उत्तर: ग. निबंध
उत्तर: क. नमिता और अमिता के लिए
उत्तर: ख. सामग्री और शैली
उत्तर: ख. दूर की चीज़ वास्तविकता से अलग आकर्षक लगती है
उत्तर: ख. प्रगतिशील
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